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सारथी । (पहले हरिण की ओर फिर राजा की ओर देखकर) महाराज जब में इस करसालय ' पर टृष्टि करता हूं ओर फिर आप को धनुष चढ़ाये देखता हूं तो साप्तात ऐसा ध्यान' बंधता है मानों पिनाक' संधान किये शिव जी शकर के पीछे जाते हूं '॥ टुष्यन्त । इस मृग ने हम को बढ़त थकाया है। देखो कभी सिर भुकाये रथ को फिर फिर देखता चोकड़ी भरता है कभी तीर लगने के डर से सिमटता है। अब देखो हांफता हुआ अधखुत्ने मुख से घास खाने को ठिठका हे फिर देखो केसी ' छत्मांग भरी हे कि” घरती से ऊपर ही दिखाई देता है। देखो अब इतने वेग से जाता है कि दिखाई भी सहज नहीं पड़ता ॥ सार०। महाराज अब तक धरतो ऊंची नीची थी”। इस से में ने घोड़े रोक रोककर “ चल्नाये थे ओर इसी से वह कुरज्ञ टूर निकत्न गया है। परंतु अब भूमि एक सी / आई । दो ही “ सरपट में ले लेंगे॥ टुष्य०। अब घोड़ों की रास छोड़ो ॥ सार०। जो ज्याज्ञा (पहले रथ को भरदौंडु चलाया फिर मंदा किया) देखिये रास ् 2, 8470 07४॥'५.2 , [40% [. छोड़ते ही घोड़े सिमटकर केसे ऋूपटे कि” खुरों की धूत्व भी साथ न लगी ”। केश खड़े करके ' झोर कनोती उठाकर घोड़े दोड़े क्या हूं उड़ अआये हैं॥ दुष्प०। सत्य है। ऐसे भूपटे कि छिन भर में हरिण से आगे बढ़ आये। जो वस्तु पहलत्ने टूर होने के कारण छोटी दिखाई देती थीं सो अब बड़ी जान पड़ती हैं झोर जो मित्नी हुई सी थीं सो अत्लग अत्नग निकली । जो टेढ़ी थीं सो सीधी हो गई। पहियों के वेग से थोड़े कात्न तक तौ दूर और नगीच में कुछ अन्तर ही न रहा था*। अब देखो हम इसे गिराते हि “॥ (धनुष पर बाण चढ़ाता हुआ) (नेषष्य में) इसे मत मारो । यह आश्रम का मुग हे ॥ सार० । (शब्द मुनता और देखता हुआ) महाराज बाण के संमुख” हरिण तो” आया। परंतु ये दो तपसस्‍वी नाहीं करते हैं कि इसे मारो सत ॥ टुष्प० । अच्छा। तो घोड़ों को रोको ॥ सार० । जो झअज्ञा ' ॥ (रास खेंचता हुआ “) (एक तपस्वी झोर उस का चेला आया) तपस्वी। (बांह ज्गकर) हे छाच्री यह मृग आश्रम का हे।इस को मत मारो | देखो इस को मत मारो। इस के कोमल शरीर में जो बाण लगेगा” सो मानो रूई के पुञ्ञ में झाग लगेगी। कहां” तुम्हारे वज- बाण कहां इस के अल्प प्राण | हे राजा बाण को उतार लो । यह तो दुखियों की रछ्या के निमित्न हे निरपशधियों पर चल्माने को नहीं हैं ॥ टुष्प० । (नमस्कार करके ”) त्नो में तीर को उतारे ल्नेता हूँ॥ (बाण उतार लिण) तप०। (थे रे) हे पुरुकुल्दीपक “ आप को यही उचित है। त्नो हम भी ऋाशीवाट देते हें कि झ्राप के ञ्ञाप ही सा चक्रवर्ती ओर धमोत्मा प्रत्न हो ॥ चेत्ना। (दोनों हाथ ड्ञगर) आप का पुत्र धमेज्ञ और चक्रत्रतों हो ॥ 43८१ [.] 85 ए४१५.,४. 3 टुष्य० ; (प्रणाम करके ) ब्राह्मणों का वचन सिर माथे ॥ तप० । हे राजा हम यज्ञ के त्निये समिध लेने जाते हैं। लागे मात्मिनी के तट पर गुरू कन्व” का आश्रम दिखाई देता है। आप को अवकाश हो ” तो वहां चत्नकर अतिथिसत्कार लीजिये। उस जगह तपस्वियों के धमेकाये निविप्न होते“ देखकर आप भी जानोगे" कि मेरी इस भुजा से जिस में प्रत्यज्वा की फटकार के चिहृभूषण हैं कितने ” सत्मरुषों की रक्षा होती है ॥ दुघ०। तुम्हारे गुरु आश्रम में हैं” या“ नहीं ॥ तप०। अपनी प॒त्रो शकुत्तल्ता को अतिथिसत्कार की आज्ञा देकर उसो की ग्रहदशा निवारने के लिये” सोमतीथे “ को गये हैं ॥ दु्घ०। अच्छा” । हम अभो आश्रम के टशेन को चलते हैं ”। उस कन्या को भी देखेंगे झ्लोर वह हमारी भक्ति का प्रभाव महर्षी से कहेगी ॥ तप० । आञ्आञाप सिधारिये। हम भी अपने काये को जाते हूं ॥ (#पस्बी अपने चेले समेत गया) दुघ० । सारथी रथ को हांको । इस पवित्र ल्ाश्चम के टशेन करके " हम अपना जन्म सफल्न करें ॥ सार०। जो जअाज्ञा ॥ (रू बढ़ाया) दुष्य० । (चारों ओर देखकर) कटाजित किप्ती ने बतलाया न होता तो नी यहां हम जान लेते कि कब तपोवन समीप है ॥ सार" । महाराज ऐसे आप ने क्या चिह्ठ देखे ॥ दु० । क्या तुम को” चिष्ठ नहीं टिखाई देते हैं। देखो वृश्षों के नीचे तोतों के मुख से गिरा मुन्यन्न पड़ा हे। ठोर ठौर हिंगोट “ कुटने की चिकनी शिल्ना रखी हे। मनुणों से हरिण के बच्चे ऐसे हित्म रहे हैं कि हमारा आहट पाकर कुछ भी नहीं चेंके। जैसे अपने खेत्ल कूट में मगन थे वेसे ही बने ह । उधर देखो यज्ञ की सामग्री के छिलके ” 4 84.0 ए ९१'७।.,4. [40० [., बह बहकर आते हैं ।तिन से नदी में केसी त्वकीर सी ” बंध रही है। फिए देखो वुछ्लों की जड़ पवित्र बरहों के प्रवाह से” धुल्वकर केसी चमकती हैं। ओर होम के धूंएं से नये पन्नों की कान्ति केसी धुंधत्नी हो रही हे”। देखो उस उपवन के आगे की भूमि में जहां की" दभ यज्ञ के लिये कट गई है मृगछोने केसे धीरे धीरे” निधड़क चरते हैं ॥ सार०। महाराज अब में ने भी तपोवत के चिह देखे “॥ दुष्य० । (घोड़ी दूर चलकर) सारथी तपोवनवासियों का अपनाम न होना चाहिये । रथ को यहीं ठहरा दो | हम उतर लें ॥ सार" । म॑ रास खेंचता हूं महाराज उतर लें ॥ . दुष्य० | (उतरकर और अपने भेष को देखकर) तपस्वियों के आाश्चवम मं नम्रता से जाना कहा है। इस ल्ये त्नो तुम मेरे राजचिष्टों ओर धनुष बाण को लिये” रहो। (रुस्पी ने ले लिये) ञ्लौर जब तक में तपोवनवासियों के दर्शन करके फिर आऊं" तब तक तुम घोड़ों की पीठ ठंडी कर त्नो ॥ सार० । जो जअ्ञाज्ञा॥ (बाहर गया) टुष्य० । (चारों ओर फिरकर और" देखकर) हप़ब में आञाप्चम में जाता हू। आश्रम में धसा) अप्राज दक्षिण भुजा क्यों फड़कती हे 7 । (उहरकर और बुछ सोचकर) यह तो तपोवन है। यहां इस अच्छे सगुन का क्या फल होना है । कुछ आश्चये भी नहीं है। होनहार कही' नहीं रुकती ॥ (नेषष्य में) प्यारी सखियो यहां झ्ाओझ यहां आओ ॥ दुष्प०। (कान छगाकर! इस फुलवारी की दक्षिण ओर क्या कुछ स्त्रियों कासाबोल सुनाई देता है। (बारें ओर फिरकर और देखकर) ज्यह्ा ये तो तपस्वियों की कन्या हें । अपने अपने विज्न अनुसार ' कोई छोटी कोई बड़ी गगरी वुक्ष सींचने को लिये “ जाती हैं । धन्य है। केसी मनोहर उन की चितवन है । जेसे इन वनयुवतियों की छवि रनवास की स्त्रियों में मित्ननी “ टुल्नेभ है वेसे ही उपवन के पूतल्नों को इस वन ०१ [.] 6 4८0(४१५॥,8. 3" की लता अपने रह्क ओर सुगन्ध से लजज्जित कर रही हैं ॥ (ड्टा होकर उन की ओर देखने लगा) (शककला अनमूया आर प्रिपंवदा खाई) शकुन्तत्ना । सखियो यहां आओ ॥ अनसूया। हे सखी शकुन्तत्ना पिता कन्‍्व को ये बिझरुत्ने तुझ से भी अधिक पारे होंगे .। नहीं तो तुरू सुकुमारी को इन के सींचन की आज्ञा न दे जाते। तेरे ” चमेली से अज्ग पर दया त्लाते ॥ शकु० । सखी निरी पिता को आज्ञा ही नहीं है। मेरा भी इन वृघष्षों में” सहोदर का सा ल्लेह हो गया है ॥ (पेड को पानी दिया) प्रियंबदा । सखी शकुन्तत्ना जिन पीधों को तू सींच चुकी हे सो तो इसी सीष्स ऋतु में फूलंगे। अब चत्न । उन को भी सीचें जिन के फूलने के ट्नि निकल गये हूं क्योंकि उन के सींचने से अधिक पुणय होगा॥ शकु० । ठीक है ॥ (और वृक्षों को सीचती हुईं“) टुष्यन्त । (बक्ति होकर आप ही जाप) कन्व की बेटी शकन्तत्ना यही हरे । उस क्मषि का हृदय बड़ा कठोर होगा” जिस ने शेसी सुकुमारी को ऐसा कठिन काम सोंपा है। और वृुश्षों की छात्न के वस्त्र पहराये हैं । इस सुन्दरी को जिस के देखते ही मन हाथ से निकल्ना” जाता है तपस्विनी बनाना ऐेसा हे जैसे” नीत्न कमत्न की पखुरो से सूखा छोंकर“ काटना | बकल्ने की कब्चुकी इस को शोभा नहीं देती है जसे नये फूल को पुराने पत्चे से ढांकना मेतल्न नहीं खाता। नहीं नहीं ”। बकलत्ने का वस्त्र इस मोहिनी की गात को शोभा देता ही“ है । यह मैं ने भूलकर कहा कि नहीं देता है क्योंकि कमत्न के फूल्ल पर काई भी अच्छी लगती हे ”। ओर पूरे चन्द्र में काली रेखा भी खुलती हे“ एेसे ही इस पद्मनी का अडज्भ बकत्ने पहरने से भो मनोहर दिखाई देता है। सत्य है रूपवती को सभी सोहता है ॥ 8 85 छ्‌ एप १'७॥.,४॥ , [ 5 ट्फ हे शकु०। आगे देखक0 सखियो देखो पवन के क्ोोंकों से आम“ के पच्चे केप्ते” हिलते हैं मानो वह हम को उंगलियों से अपने निकट बुत्नाता है। चत्नो । वहीं चत्नें ॥ (सब वृष्य के निकट गईं) प्रिग्;। सखी यहां घड़ीक विश्वाम ले ल्न॑ ॥ शकु० । क्यों ॥ प्रिग। इस लिये कि जब तक तू इस आम के नीचे खड़ी है यह शेसा शोभायमान हो रहा है मानो इस से” त्नता त्निपट रही है ॥ शकु०। सखी इसी से तेरा नाम प्रियंवदा हुआ है कि” त्‌ बात बहुत प्यारी कहती हे ॥ दुष्य० । (जाप ही आप) प्रियवदटा ने बात प्यारी तो कही। परंतु सत्य भी कही क्योंकि शकुन्तत्ना के” अधर हैं सो ई त्मता के नवीन पल्लव हैं” भुजा हैं सो ई बेत्नि हैं ओर नव योवन है सो ई विकसित फूल्न हैं॥ (शकन्तल्ा ने पानी का घड़ा कुका दिया) अनसूया | सखी शकुन्तत्ना इस लता को क्यों छोड़े ” जाती है जिस ने पिता कनन्‍्व के आश्चम में तेरी ही भांति रप्षा पाई है ॥ शकु० । किसी दिन में झाप अपने को न भूल जाऊं सखी प्रियंवदा में तुम्हें कुछ भत्ने समाचार सुनाऊंगी ॥ प्रि० । क्या समाचार हैं सखी ॥ शकु" । देखो यह माध्वी त्वता यद्यपि इस के फूलने के दिन अभी नहीं आये हैं केसी ” जड़ से चोटी तक कल्लियों से त्वद्‌ रही हे ॥ (दोनों तुरंत छत्ना के निकद गई) प्रि० । सच्ची कह ॥ शकु० । में सच्ची क्या कह | तू ही देख त्ने ॥ प्रि० । (बड़े चाव से) हे शकुन्तत्वा इस सगुन के भरोसे पर में कहे” देती ह्ं कि तुझे अच्छा वर मित्नेगा । ओर वह थोड़े ही दिनों में तेरा हाथ गहेगा ॥ | (छत़ा के निकढ गई) 4८% ॥.] 857 ४१५.,४8, 7 शक०। (रिस सी होकर ) ऋ्याज तके क्या सकी ह ” प्रिग्। सखी यह बात में ने हंसी से नहीं कही । हम ने पिता क के मख से भी कछ एसी ही "” सनी हे | झोर इसी से तेरा सीचना इस त्वता को सफल हइञ्आ है ॥ आन" । खोर इसी से इस लता को ते ने बड़े चाव से सीचा है ॥ शक० । माघ्वी लता तो मेरी बहन है। इसे क्यों न सींचती ॥ (पानी का घड़ा कका दिया) टुष्य० । ज्ञाप ही जाप) निश्चय यह ऋषि की बेटी सजाती रही से नहीं है अथवा मेरे ही मन में कुछ संदेह उपजा है । परंतु इस पर मेरा चित्च ऐसा लगा हे कि अवश्य यह छात्री के ब्याहन योग्य “ होगी “। नहीं तो सज्जनों के हृदय में जो कभी कछ संभ्रम उपजता हे तरंत ही अन्तःकरण के उत्साह से मिट जाता है। मेरा मन इस के बस हुआ इस लिये निश्चय यह ब्राह्मण की बेटी नहीं हे जो मरे ब्याहने योग्य न हो । भत्ना हो सो हो / इस का सत्य वुत्तान्त तो खोजना चाहिये शकु०। (ुख फेर्कर टई टुई “ यह ढीठ भांरा नई चमेली को छोड़ मेरे ही मुख पर वार वार गूंजता है ॥ (घबराती सी) टुष्य? । (जाप ही आप कितनी बेर हम ने नगर की स्त्रियां को जउड़ते भारे से कटाक्ष करके “ मुख मोड़ते देखा है परंतु सदा बनावट ही पाई। इस भोरी के भोंह मरोड़ने ओर आंखें तिरछी करने में केसा सीधापन है। हे भोंरे तू बड़ा बड़भागी हे कि इन चज्च॒त्न नेचरों की कोर को स्पश करता है ओर कानों के निकट ऐसा जाता है मानो कुछ रहस्य का संदेसा सुनावेगा ” । जब तक वह हाथ उठाती है तू अमृत- भरे होठों से रस ले जाता है ॥ शकु०। यह ढीठ भांरा न मानेगा। अब यहां से अन्त चल्लूं | (दूसस गैर गई) ऋआरी देखो यहां भी पापी ने पीछा न छोड़ा | हे सखियो भोंरा मुझे सताता है। इस से छटाओ ॥ 8 6५ ८ 0९१'७.,5. [8८% [. प्रि० । हुसुकबाक0 हम छुटानेवात्नी कोन हैं। राजा दुष्यन्‍्त छुटावेगा जो सब तपोवन का रखवाल्ना है ॥ तुष्प० । (आप ही जाप) यह अवसर प्रगट होने का अच्छा है। (घोड़ा सा आगे चलकर) मुझे डर किस का है । परंतु (इतना कह फिर हृठ गया) इस सेतो खुत्न जायगा कि में राजा ह्ं। अब जो हो सो हो “ साधारण परदेसी बनकर इन से अतिथिसत्कार मांगूं क्योंकि इन से कुछ बात चीत तो अवश्य करनी चाहिये ॥ शकु०। यहां भी भोरे ने पीछा न छोड़ा। अब कहां जाऊं। (शक ओर को चलती हुई और जिधर भौंरा ज्ञाता है उधर देखतो हुई) ञ्प्ररे टूर हो | हे सखियो मैं जहां जाती हूं यह मेरे पीछे ही पीछे त्वगा फिरता हे । इस से मुझे बचाओ ॥ टुष्य० । (छठ षढ आगे बढ़कर जब तक दुष्टों को टणडदेनेवात्ला में पुरुवंशी पृथी का रखवात्ना बना हूं तब तक कोन शेसा हे जो इन ऋषि- कन्याओं को सताता है ॥ : (तीनों चकित होकर देखने लगीं) अन० । महाराज यहां सतानेवाल्ा मनुष्य तो कोई नहीं है। हमारी सखी को एक भोंरे ने घेरा था । इस से यह भय खा गई है ॥ दोनों सख्ली शकनाला को देखती हुई) टुष्प० । (शकुन्ला के निकट जाकर) हे सन्दरी तेरा तपोत्रत सफल्न हो / ॥ (शकुल्तला लज््तित हो धरती की और देख चुप रह गई) जन" । इस अनोखे पाहने को अच्छे आदर से त्नेना चाहिये ॥ प्रि०ण्। आओ परदेसी | सखी शकुन्तत्ना तू जा कूटी में से कुछ फत्न फूल भेट को लेआ। पांव धोने को जत्न नदी से ले ल्नेंगी ” ॥ (पेड सौंचने के घड़ां की ओर देखती हुई) दुध्थ० । तुम्हारे मीठे बोल्लों ही से कत्नेजा ठंढा हो गया ॥ अन० । आझ्ाओ पाइहने घड़ीक इस कट्त्नीपत्र के झ्ासन पे बिराजो। 4८% [.] 83 ४१५।.३. 9 यहां छाया शीतल है ओर ज्ञाप परिश्रम करके आये हो । यहां विश्वाम त्नो ॥ दुध० । तुम भी तो थक गई होगी । झाझो छिन भर बेठ लो ॥ उप्रन०। (होले * शककला से) ध्तिथि का संमान करना उचित है। आशेो हम भी बेठें (रूब बैठ गई) शकु०। (आप ही आप इस पाहने को देखकर मेरे मन में ऐसी बात उपजती है जो तपोवन के योग्य नहीं है ॥ टुष्य० । (शक शक करके सब को देखता हुआ) दर युवतियों जेसी विधाता ने तुम को बेस ओर निकाई दी है प्रीति भी तुप्हारे ” आपस में अच्छी रखी हे ॥ प्रि० । (हौछे अनसूषा से) सखी अनसूया यह नया अतिथि कहां से आया है जिस के अज्ज में सुकुमारता के संग गुरुता ओर बोल्नी में मधुरता के साथ “” गम्भीरता है। ये लब्छन तो बड़े प्रतापियों के हैं ॥ जन? । (होले प्रियंदा से) सखी म॑ भी इसी सोच विचार में हं। मरे मन में आती है कि इस से कुछ पूछूं। अग० महात्मा तुम्हारे मधुर वचन सुनकर मुझे भ्यासती हे कि तुम कोई राजकुमार हो । सो कहो कोन से राजवंश के भूषण हो आर कहां की प्रजा को विरह में व्याकुल छोड़ यहां पधारे हो। क्या कारण हे जिस से “ तुम ने अपने कोमल गात को इस कठिन तपोवन में पीड़ित किया है ॥ शकु० । (आप ही आप) अरे मन तू आतुर मत हो । धीरज घर । तेरे हित की बात अनसूया ही कह रही है “ ॥ टुष्य० । आप ही आप) अब में क्‍्योंकर प्रगट हं ओर केसे छिपा रहं। हो सो हो इन से बातें तो करूंहीगा / । (गद चनयूषा से) हे ऋषिकुमारी में पुरुवंशी राजा के नगर में निवास करता हूं। ओर पुरुवंशियों ने मुझे राज्य के धमेकाये सांप रखे हैं .। इस लिये आश्रम के दशेन को आया हूं ॥ ]0 84070१'७॥.४. [4०५ [. अन० । महात्मा तुम्हारे पधारने से इस वन के धमेचारी भी सनाथ हुए ॥ (शकुनाला कुछ लज्जित झोर मोहित सी हो गई झर दोनों सखी कभी उस को ओर कभी राजा की ओर देखने लगीं) इआन० । (होले शकुनला स) कटाचित जझ्ञाज कन्व घर होते ॥ शकु०। तो क्या होता “ ॥ उप्रन० । इस पाहने का आझाटर अनेक भांति ” करते “ ॥ शकु० । (एस सी होकर) चत्न। परे हो । तेरे मन में कुछ ओर ही है। जा। मेंतेरीन सुनूंगी /2 | (अलग ज्ञा बैठी) टुष्य० । (अनमूया और प्रियंवदा से) हे युवतियों अब में भी तुम्हारी सखी का वृत्तान्त पूछता हूं .॥ दोनों । यह ञ्राप का अनुमह हे ॥ दुष्प९ । कन्‍्व ऋषि तो बह्मचारी हैं । फिर यह तुम्हारी सखी उन की बेटी क्‍्योंकर हुई ॥ अन० । महाराज सुनो | कुशिक के वंश में एक बड़ा प्रतापी रा- जि है ॥ दुध्यथ० । हां में ने जान ल्निया। तुम विश्यामित्र का नाम“ लोगी / । में नेभी सने हैं॥ आन" । उसी से हमारी इस सखी की उत्पत्ति हे। झोर कनन्‍्व इस के पिता ऐसे कहाते हैं कि” जब इस का नातल्न भी नहीं कटा था तब उन को वन में पड़ी मितल्ली थी “ै। ओर उन्हीं ने पात्नी पोसी है ॥ दुष्प" । पड़ी मितल्नी थी “। यह बात सुनकर तो “ मुक्े आश्चये होता है। अब इस की जड़ से उत्मन्नि कहों “ ॥ अन०। अच्छा सुनो। में कहती ह्ूं। जब उस राज्धि ने उस तप किया तब देवताओं ने शट्ठा मान” उस का तप डिगाने के निमिन्न मेनका नाम अप्सरा भेजी ॥ 3. टप 4, | 8552 ० |. है हक, ४ 4] टुष्प०। सच है । देवता ऐसे ही हूं आरों की तपस्या से डर जाते हैं * भत्ना फिर क्या हुआ ॥ जअन० । वसन्‍्त ऋतु में मेनका की मोहिनी छवि निरखते ही .. .. (इतना कह लज्जित हो गई टुष्प० । आगे अप्सरा से है ॥ जन? । हां ॥ तुष्प० । (आप ही चाप) ह्यब “ देव ने किया तो मनोरथ पूरा हुआ। अगठ) क्यों न हो । इसी से इस का ऐसा रूप है। नहीं तो मनुण- जाति की स्त्रियां मं इतनी ट्मक कहां पाइये * (शकन्तला लान् से सिर कुकाकर बेठ गई) दुष्प० । (आप ही चाप) मेरी मनोकामना सिद्ध होने के लबच्छन तो दिखाई देते हं। परंतु द्विविधा यही है कि सखी ने ब्याह की बात कहीं हंसी से न कही हो ॥ प्रि० | (हंसकर पहले शक॒नका की ओर फिर राजा को ओर देखती हई) क्या ज्याप के मन में कु कहने की हे॥ (शकुन्तल्ा उसी से बरन्ती हुई दुष्प०। हां मेरे मन में इस अनूठे चरित के सुनने की अभी आर झअभिललाषा हे ॥ प्रिग्। महाराज जो कुछ कहो सो बड़त सम बककर कहियो क्योंकि तपसवी त्लोगां पर किसी का बस नहीं होता हे दुष्प०। में यह पूछता हूं कि शज्जाररस के बरी ” इस वानप्रस्थ- नियम में तुम्हारी सखी ब्याह ही तक रहेगी | या ” सदा अपनी सी “" जअखोंवाली हरिणियों ही के संग खेत्नेगी ॥ प्रि० । हे महात्मा हमारी सखी परबस हे।आओर इस के बड़ों का यह संकल्प हे कि इसी के समान ” वर मिले तो दूं॥ दुष्प० । समान वर मिलना तो बहुत कठिन है। (आप हो ज्ञाप) अरे 49 हम ने जान लिया कि शकुन्तत्ना छत्री की बेटी 2 $500 0४१'७,8, [4८% 7. मन अब तू इस के मित्नने की चाह कर । तेरे संदेह का निवारण हो गया । जिस को तू जतल्नती आग समभ्दा था सो तौ गल्ने का हार बनाने योग्य “ रल निकला ॥ शकु० । (रस सी होकए अनसूया तू मुझे यहां ठहरने न देगी। ले। में जाती हूं ॥ आन" । क्यों काहे को जाती है ॥ शकु० । में गोतमी सं जाकर कहंगी कि अनसूया मुझ से बकती हरे ॥ (यह कहकर उठी) अन० । हे सखी यह उचित नहीं है कि तू ऐसे पाइने को विना सत्कार किये छोड़कर चल्नी जाय ॥ (शकुनला ने कुछ उन्चर न दिया । चल खड़ी हुई) टुष्य० । (शेसे उठा मानो रोकेगा ४ परंतु आप ही रूक गया फ़िर आप ही आप कहने लगा) झहा कामी मनुष्यों की केसी मति भज्ज हो जाती है। देखो में ने तपस्वी की कन्या को चलने से रोकना चाहा“ झौर झासन से खड़ा भी हो गया। कदाचित धमे न संहालता तो केंसा हो ता ” ॥ प्रि० । (शकुलला के निकट जाकर) सखी यहां से जाने न पावेगी ॥ शकु० । (पौछे हटकर और भौंह चढ़ाकर) क्यों न जाने पाऊंगी। मुके कोन रोकनेवाल्ना है ॥ प्रिग। सखी अपना वचन निबाहे तो । अभी तुे दो रूख सीचने को आर रहे हैं “। इस ऋण को चुका दे। तब चल्नी जाना ” रोकती हुई) दुष्य* । वक्त सीचने को घड़े उठाते उठाते ” तुम्हारी सखी थक गई है। देखो इस की बांहें शिथित्न हो गई हैं त्लाल्न हथेली अधिक त्नाल पड़ गई है छाती धुकधुकाती है मुख पर पसीने के बिन्दु मोती से ढरक रहे हैं चुटीला ढीला होकर कपोत्नों पर अल्कें बिथुरती हैं तिन को एक हाथ से थाम रही है। यह ऋण मुके यों चुकाने दो। (अंगूठे ॥ (बल कर " 6०% ॥.] 6 5707४१'५।.8. १8 प्रियंददा को दी और दोनों सखी म॒द्री पर दुष्पन्त का नाम खुदा देखकर एक दूसरी को ओर चकित सी निहास्ने लगी) इस के लेने से तुम यह संकोच मत करो कि यह राजा की वस्तु है क्योंकि मं भी तो राजपुरुष हं। मुझे यह राजा से मित्मी है ॥ प्रि०ग्;/ जो ऐसी ” हे तो महात्मा इसे अपनी उंगत्नी से न्‍्यारी मत करो । तुम्हारे कहने ही से कण चुक गया ॥ (मुसक्याकर जंगूठी फेर दी) अन० । हे सखी शकुन्तत्ना इस महात्मा ने दया करके तुरे ऋण से छुड़ा दिया । अब चाहे तू चत्नी जा ॥ शकु० । (आप ही जाप) जो में अपने बस में रही तो क्या इन बातों को भूत्न जाऊंगी। (प्रग०े जाने की आज्ञादेनेवात्ती अथवा रोकनेवाली तुम कोन हो ॥ टुष्य० । (शकुल्तछा की ओर देखकर आप ही जाप) जेसा मेरा मन इस पद्मिनी से उल्बका है वेसा ही इस का “ भी मुझू से अटका दिखाई देता है। यही मनोरथ पूरा होने के उत्साह का कारण है। यद्यपि यह मेरी _ बात में बात नहीं मित्नाती हे तो भी जब में कुछ कहता हूं बड़े चाव से कान लगाकर सुनती है । मेरी ओर “ निधड़क खड़ी नहीं होती तो भी उस की दृष्टि दूसरी ओर नहीं जाती है ॥ (नेषथ्य में) तपस्वियों शाश्म के जीवों की रक्षा करो। राजा दुष्यन्त आखेट करता निकट आ पहुंचा है। देखो धोड़ों की खुरतार / से धूत्न उड़ उड़कर तुम्हारे भीगे वस्त्रों पर जो वुध्यों के ऊपर सूख रहे हैं टीड़ो के समान गिरती है। हे तपस्वियो यह हाथी हमारो तपस्या के विध्न की मूत्ति होकर तपोवन में चत्ना आता है। देखो वृश्ष के गुद्दों को दांतों से तोड़ता ओर पेरों में त्वता का लज्ञर डाले " घूमता आता है। देखो हमारे तप में इस ने केसा ” विध्च डाला है। हाथी के भय से हरिणों का भूंड तिच्र बिच्चर हो गया है ओर यह रथ को देख डर गया है। इस से वन का नाश किये डालता है॥ (अ्षिकुमारियों ने कान लगाकर सुना फिर चोंक पड़ी) १4 807 ए४१५॥.8. [4०० [. दुष्पय० । (चाप ही आप) ञ्रे इन पुरवासियों । मुभे्‌ ढूंढते ढूंढते यहां आकर वन में विम्त डालना । अब इन के पास जाना पड़ा * ॥ प्रि० । हे महात्मा अब तो हम को इस मतवाले हाथी से डर लगता है। आज्ञा दो तो अपनी कुटो को जांय ॥ अन०। सखी शकुत्तत्ना तेरे लिये गोतमी झऋकुलाती होगी । आ वेग वेग चतल्ली झआ जिस से“ सब एकसंग छेम कुशत्न से कुटी में पहुच॑ ॥ शक० । (होले चलती हुई) ऋ्ञात्नी मेरी तो पसली में पीर होती है। मर से नहीं चला जाता * दुष्प०"। हे यवतियो तम डरो मत। निधड़क चत्नी जाओ । में इस आश्यम में कुछ विप्न न होने टूंगा ॥ (सब उठ खड़ी हुईं दोनों । हे महात्मा जेसा तुम सरीखे ” पुरुषों का सत्कार होना चाहिये सो हम से नहीं बना हे । इस लिये हम यह कहते जजाती हैं * कि कभी फिर भी दशेन देना / ॥ टुष्प९ । ऐसा मत कहो। तुम्हारे देखने ही से हमारा सत्कार हो गया॥ शक" । हे अनसया एक तो” मरे पांव में दाभ ” की पेनी अ्रणि तल्मगी हे। टूसरे करे “ की डार में अज्वत्न उत्लका है। नेक ठहरो तो। इसे स॒लक्का ल्लूं॥ (ुष्पन्त की झोर देखती और ठिठकती हुई. चली) टुष्य० । (बह भरकर! हाय ये तो सब गईं । झ्ब में कहां जाऊं। हे देव प्यारी शकुन्तत्ना से कुछ काल ओर भेट क्यों न रही। अब मुकू से नगर की ओर तो चल्ना नहीं जाता है “। इस से साथवाल्नों को बिदा करके कहीं वन के नगीच ही डेरा करूंगा “ । शकुन्तत्ना के हाव भाव देखने की त्नालसा मेरे हृदय से केसे जायगी ”। शरीर तो आगे को चत्नता भी हे परंतु मन पीछे ही रहा जाता हे जैसे पवन के संमुख चत्नती पताका ” पीछे ही को उड़ती है ॥ (बाहर गया) 4०7 ॥.,] 85400775१५,/. ]६ च्प्क्कू २ हट पे ब््क 5 पल पक स्थान वन के निकट चोगान मं राजा के डर ॥ (ख्वास लेता हुआ आर विषाद करता हा माढ्व्य' जाया) ० । माढव्य । इस मृगयाशीत्न राजा की मित्रता से हम तो बड़े टुखी हैं। मन में ऐसी आती हे कि सब छोड़ छाड़ बेठ रहिये । यहां तो मीष्म की दुपहरी में भी यह मृग आया वह वराह गया उधर शाद्त्न जाता है यही कहते इस वन से उस में उस से इस में पशओं की भति भागना रहता है। कहीं छाया भी इतनी नहीं मित्नती जहां कुछ विश्वाम त्निया जाय । पहाड़ की नदी में वुक्षों के पन्ने गिर गिरकर सड़ गये हैं । यास लगे तो उन्हीं का पानी पीना पड़ता है। ओर खाने को शूत्म पर भुना मांस मिलता है। सो भी कुसमय'। घोड़े के पीछे दोड़ते दोड़ते देह ढील्नी हो जाती है झोर रात को नींदभर सोना नहीं मित्नता | फिर बड़ी भोर ही दासीजाये मांस ही मांस पुकारते हैं * आोर चत्नो वन को चत्नो वन को यह चिल्ला चिल्लाकर कान फोइ़ते हिं।ये दुख तो थे ही तब तक'। एक नया घाव ओर हुआ कि हम से बिछुड़कर राजा मृग के पीछे चल्नते चलते तपस्वियों के आश्चम में पहुंचा । वहां मेरे क्भाग्य से उस की दृष्टि एक तपसवी की कन्या पर जिस का नाम शकुन्तत्ना है पड़ गई। अब नगर का लोटना केसा '। इन्ही क्षशों के सोच विचार में सब रात मेरी आंख नहों लगी। जब तक राजा को देख न लूंगा तब तक न जानू क्या गति मेरी होगी | । चपब कब ऐसा होगा कि यहां से ल्लोटकर फिर राजा को सिंहासन पर बैठा देखूं। (ज्गे को चला और देख) अहह वह भेष बदत्ने आता है । हाथ में धनुष बाण तो हे परंतु सिर पर मुकट की ठोर वन के फूल्नों की मात्ना धरी है। ञ्राता तो इधर ही को ह । अब में भी अद्भभड्ढ १6 540 07४१५।॥,३. [4८० . करके खड़ा हो जाऊं। (छागी ठेककर खड़ा हुआ) चत्नो यों ही विश्वाम सही ॥ | (ऊपर कहे हुए भेष से दुष्पणता आया) टुष्यन्त । (ऊंची खास लेकर आप ही आप) क्या कीजिये। पारी का मिलना तो सहज नहीं हे झोर मन मिलने को ऐसा ' तड़फता है। यद्यपि ऋभी हमारी परस्पर प्रीति का फत्न नहीं मिलत्मा है परंतु दोनों के जी में मिलने की चाह लगी है। (रुकाकर) जब किसी की * किसी से त्नगती है तो यही सूकती है कि उस की भी मुझ से लगी होगी '। उस ने चाहे अपनी सखियों की ओर ही देखा हो परंतु में ने यही जाना कि मुझू ही पर लेह की हृष्टि की है। फिर जब उस को सखियों ने अनखा ” तब वह चाहे रिस हो हुई हो परंतु मरे मन में यही भ्यासी “ कि यह भी कुछ कटाश्ल मुझ ही पर है। सत्य हे अपने प्रयोजन की बात देखने मं प्रमी जनों की दृष्टि बड़ी पेनी होती है ॥ माठ०। जैसे खड्टा था वैसे ही खड़ा रह) हे मित्र मेरे हाथ पांव नहीं चलते हैं। इस त्रिये केवत्न वचनों ही से तुम को आशीवोाद देता हू । आप की जय रहे ॥ | टुष्प० । (उस को झोर देखकर जोर मुसक्याक) कहो सखा तुम्हारा अन्जभज्ज क्यों हुआ ॥ माढ० | अपनी उंगली से आंख कुचोकर आप ही पूछते हो कि आंसू क्यों आये ॥ दुष्प” । हम समके नहीं । तुम ने क्या कहा ॥ माढ० । देखो वह बेत का वृक्ष नीचे को कुक गया हे।सो कहो झपने आप भकुका हे या नदी के प्रवाह से ॥ दुय० । नदी के प्रवाह से कुका होगा ॥ माढ०। रेसे ही मेरे अद्भभज्ञ होने के तुम ही कारण होगे ॥ तुष्य० । क्योंकर ॥ 4&९०० १.] 5830 07७१'५॥.,8. )7 माढ० | में पूछता हूं कि यह बात तुम को कब योग्य है कि ऐसे राजकाजों को भूल ओर ऐसे रनवास को त्याग यहां वन में बसो ओर वनवासियों के से काम करो । नित्य कुत्तों ओर म॒गों के पीछे दोड़ते दौड़ते मरा तो अद्भ शिथित्व हो गया है। अब कृपा करके एक दिन विश्वाम लेने दो ॥ टुष्य० । (आप ही आप) इधर यह भी कहता है उधर मेरा चित्र भी आषिकुमारी की सुध में आखट से निरुत्साह हो रहा है । अब में इस धनुष को यारी की सहवासी हरिणियों पर जिन की आंखों ने उसे भोली चितवन सिखायी है केसे चत्नाऊंगा ॥ माढ० । (राजा के मुख की ओर देखकर) तुम्हारे मन में जाने क्या सोच हे। मेरी बात तो ऐसी हो गई जेसे वन में रोना “ ॥ दुष्प? । हंसकर) मेरे मन में यही हे कि तुझू सखा की बात मानूं ॥ माठ० । (प्रसन्न होकर) बड़ी ज्पाबेत्न ज। ॥ (उठ खड़ा हुआ ट्बेलता का मिस करता हुआ) ५ टु्यघ० । मिच ठहरो | हम को कुछ ओर कहना है ॥ माढ० । कहिये ॥ दुष्प० । जब तुम विश्वाम तल्मे चुकी तब हम एक ऐसे काम में तुम से सहायता लेंगे जिस में कुछ दौड़ना भागना न पड़ेगा ॥ माढ० । अहह क्या खांड के लड्डू खिलाओगे तो । तो अभी अच्छा अवसर हे ॥ दुष्प० | अच्छा । अभी कहता हूं किसी द्वारपात्न को बुलाओ ॥ (ड्वारपाल आया) द्वारपात्न । (नमस्कार करके) स्वामी की क्या जाज्ञा हे ॥ दुष्प० । हे रेवतक तुम सेनापति को बुलाओ ॥ द्वार० । बहुत अच्छा । (बाहर जाकर सेनापत्ि को बुला लाय! ज्पाक्ो तुम्हारी ही * कह राह देखते महाराज बेठे हैं ॥ 8 8 ः 857 07४४१७॥.8, [8०% व, सेनापति । (टृष्पना की ओर देखकर आप ही आप) मृगया को बड़ों जे दोष दिया है और अनथे कहा है| परंतु हमारे स्वामी को गुणदायक हुई है। वार वार धनुष खेंचने से महाराज का शरीर केसा कड़ा हो गया है कि धूप नहीं ब्यापती न पसीना आता है। स्वामी का शरीर यद्यपि टुबत्ना है. तो भी डील पहाड़ सा ओर बत्न हाथी का सा है ”। (राजा के निकट जाकर प्रगण) स्वामी की जय हो । महाराज इस वन में हम ने आखेटी पशुओं के खोज“ देखे हें । यहां मृगया बढ़त है। आप केसे बेठ हो ॥ दुध्यथ० । हे भटद्रसेन इस माढव्य ने मृगया की निन्‍दा करके मेरा उत्साह मन्द कर दिया है ॥ सेन० । (हौले गाब्य >े) तुम अपनी बात पर बने रहो ”। में स्वामी के मन सुहाती ” कह्ंगा । धग)े महाराज इस रांड़के को बकने दीजिये । भत्ना आप ही सोचो कि मृगया में गुण हे या अवगुण | एक तो यही गुण है कि इस से आहार पचकर उटर हत्नका हो जाता है ओर शरीर चलने फरने के योग्य होता है । देखिये क्रोध ओर भय से पशुओं को केैप्ती केसी ” दशा होती है। धनुषधारियों की यही बड़ाई है कि चलते बेके को बेध ल्नें। मृगया को दोष लगाना मिथ्या है । इस से उत्तम तो मन बहल्नाने की” कोई बात ही नहीं हे ॥ माढ० । (रईस से) अरे राजा को तो मृगया की टेव त्नग गई है। तुफे क्या हुआ है जो“ तू ऐसी बातें कहता है। वन में बड़त““ दोड़ता फिरता है। किप्ती दिन कोई बृढ़ा रीछ तुरे स्यार के धोखे न पकड़ त्ने “॥ दुष्य० । हे सेनापति यह आश्चम का समीप है । अब हम आखेट की बड़ाई करने में तुम्हारा पष्त नहीं त्ने सकते हैं । झ्लाज भेंसों को आनन्द से तलावबों में ल्लोटने दो । हरिणों को घनी छाया में बेठकर रोंथ करने दो । सूअरों को अधसूखे पोखरों में मोथे की जड़ खोद खाने दो। मेरे धनृष की प्रत्यज्वा भी ढीली हो गई है। ञ्ाज इते भी विश्वाम मिलेगा॥ 4८५ ॥.] 868 ए7४१५॥.,8. १9 सेन" । जो इच्छा महाराज की ॥ दुष्य० । झागे जो कमनेत बढ़ गये हैं उन को लोटा लो ओर सेना के लोगों को बरज दो कि इस तपोवन्त में कुछ विन्न न डालें । उन को समझा दो कि यद्यपि तफ्सवी लोगों में छरमा बड़त होती है परंतु जब उन को क्रोध आता है तो उन के भीतर टाहक शक्ति भड़क उठती है *। जैसे सूयेकान्ति ” मणि का स्वभाव है कि वेसे “ तो छूने से“ ठंढी त्वगती है” परंतु सूये के संमुख होते ही अ!ग के समान हो जाती है * ॥ सेन० । जो आज्ञा महाराज की “ ॥ माढ० । चत्म जा | ऐसे ही तेरा मुख बिगड़ता रहे ” ॥ (सेनापति गया) दुष्प? । (सेवकों की ओर देखकर तुम भी अपना भेष उतार डालो ओर रेवतक तुम द्वार पर रहो | जब हम पुकारें तब उत्तर दो ॥ दार०। जो झझ्ाज्ञा ॥ (बाहर गया) माढ०। इस स्थान को भल्ला आप ने निमेत्न कर दिया। अब यहां कोई मक्खी भी नहीं रही” । सुन्दर वृक्षों की छाया में इस आसन पर बेठिये। में भी सुख से विश्वाम लूंगा और वह बात सुनूंगा जिस में जाप ने कहा था कि दोड़ धूप न होगो ॥ टुष्घ० । पहल्ने तुम ही बेठो ॥ माढ० । आइये ॥ (दोनों श्क वृश् के नौचे बेटे दुष्ड० । हे माढ्य्य इस संसार में जो पदाथे देखने योग्य है उस के दर्शन का सुख तेरे नेत्रों को प्राप्त नहीं हुआ ॥ माढ० । सत्य हे काहे से कि इन नेचतरों को नित्य महाराज का दशन मिलता है ॥ दुष्प० । अपनी बड़ाई तो सभी को भाती है *। परंतु मेरे कहने का तात्मये यह है कि तेरे नत्रों ने कभी शकुन्तत्ना वो नहों देखा है जो इस झआझाश्रम की शोभा हे ॥ माढ०। (्ञप ही आप) ऐसी तल्गन वो बढ़ने देना ऋच्छा नहीं है। 20 8370 0४१७॥.&, [4०% व, प्रग./ जान पड़ा कि मित्र तुम तपसवी की कन्या को चाहते हो। सो भत्ना “ इस से क्या मित्नेगा | वह तो ब्राह्मण की बेटी है ॥ तुष्प० । हे सखा टूज के चन्द्रमा को संसार मुंह उठाकर ओर आंख खोलकर किस प्रयोजन से देखता है। तू निश्चय मान कि झत्नीन” वस्तु में पुरुवंशियां का मन कभी नहीं जाता है। शकुन्तत्ना एक राजापि की बेटी अप्सरा के पेट से हैे। जानते हो उस की मा उसे पृथी पर डाल स्वगे को उड़ गई । देवयोग से” कन्‍्व क्षि वहां ञ्रा निकत्ने। उन्हों ने ऐसे उठा ली जेसे कोई मालती के कुम्हत्नाते नवीन फूल को आक के पन्ने से उठा त्ने ॥ माढ० । (हंसकर! जेसे किसी की रूचि छुहारों से हटकर इमत्नी पर लगे तेसे ही तुम रनवास के स्त्रीरलों को छोड़ इस गंवारी पर आसक्त हुए हो ॥ दुप० । हे सखा जो तू उस को शक बेर देखे तो फिर ऐसी” न कहे॥ माढ० । सत्य है। जिस की राजा बड़ाई करे वह क्यों उच्तम न होगी ॥ दुष्प० । जुसक्पाक) बहुत कहां तक वर्णन करूं “। जब में ब्रह्मा की शक्ति को सोचता हूं ओर शकुन्तत्ना के रूप को देखता हूं तो मेरी समभ्‌ में इस सरस रल की चमक उस की सब सृष्टि को फीका करती है । जितने सुरूप के लक्षण हं विधाता ने सब उसी मोहिनी में इकट्रे किये हैं ॥ माढ० । जो ऐसी है तो उस के आगे” सब रूपवती स्त्री निरादर हं॥ दुष्य० । मेरी दृष्टि में तो ऐसी ही है। न जानूं यह अऋनसूंघा फूल्म यह झऋछूता पन्ना यह विना विधा” रल यह नया मधु यह अखगराड पुण्य का फत्न यह रूप की राशि विधाता किस बड़भागी के हाथ लगावेगा “ ॥ माठ० । उस से वेग विवाह कर त्नो। नहीं तो झखण्ड पुण्य का फत्न 4८% 7.] 837 एप ॥.8, 2 किसी ऐसे ञनगढ़ योगी के हाथ लग जायगा जिस का सब शजन्जार सिर में हिंगोट का तेल होगा ॥ दुष्प० । मिच वह परबस है ओर उस का पिता घर नहीं है ॥ माढ० । भत्मा तुम को वह केस्ता चाहती है ॥ दुष्प०। सुनो । तपस्वियों की कन्या स्वभाव की सकुचीली “ होती हैं। तो भी जब में उस के संमुख हुआ उस ने आंख चुराकर मेरी ओर देखा छोर किसी मिस से हंसी भी । लाज के मारे वह न" तो प्रीति को प्रगट ही कर सकी न गुप्त ही रख सकी ॥ माढ० | ओर क्या। देखते ही तुम्हारी गोट्‌ में झा बेठती “ ॥ दुष्प० । जिस समय मुरू से बिछुरने त्वगगी बड़ी ही सुघड़ाई से अपनी चाह दिखायी | थोड़ी सी चल्नी फिर पांव में कांटा लगने का मिस करके बेअवसर” खड़ी हो रही । फिर कुछ चलकर वृक्ष से अपने वल्कलवस्त्र छुड़ाने के मिस” पीछे को निहारी ॥ माढ० । धन्य है आये तो मृग के पीछे थे”। यहां ओर ही खेत्ल रच दिया '। मित्र इसी से यह तपोवन तुम को उपवन से अधिक प्यारा लगता हे ॥ दुय० । हे सखा किसी किसी तपसस्‍्वी ने मुझे पहचान भी लिया. हे। अब कहो किस मिस से इस आशख्चम में चत्नें ॥ माढ० । इस से हअधिक ओर क्या मिस राजा को चाहिये कि तपस्वियों से अन्न का अपना छठा भाग मांगो ॥ टुष्घ० । धिक मूखे | कुछ ओर मिस बतल्ा जिस में बड़ाई मित्ने । तपस्वियों की रश्ला के लिये तो में रत्नों के ढेर उठा डाल तो भी उचित हो । क्योंकि जो सब वर्णा से राजा को प्राप्त होता हे सो सदा नहीं रहता परंतु तपस्या का छठा भाग अश्षय है। सो ये ब्राक्षण हम को देते हैं ॥ (षष्य में) अब हमारा मनोरथ सिद्ध हुआ ॥ 22 853707४१५].5. [4८% ॥ टुष्प० । (कान लगाकर) अहा यह तो तपस्वियों का सा ” बोल हैं ॥ (ड्वारपाल आया) । द्वारपात्म । स्वामी की जय हो | दो ऋषिकुमार द्वार पर आये हं॥ दुष्प० । तुरंत त्वाओ ॥ द्वार०। ज्पभी त्लाता हू । (बाहर गया ओर दो ब्राह्मणों को साथ लेकर आया) इधर आओ | इधर आशझो ॥ पहला ब्राह्मण । (राजा को ओर देखकर) जहा इस तेजस्वी राजा के देन से मन में केसा विधश्यास उपजता हैे। क्या कारण है जिस से इस के संमुख आते ही मेरा सब भय मिट गया। मेरे जान / यह हेतु होगा कि इस की प्रकृति भी तपस्वियों की सी है ' । हमारी भांति इस ने भी वन का निवास लिया है झोर हमारी रक्षा करना यही अपने लिये दिन प्रतिदिन तप संचय करना ठहराया हे । जितेन्द्री राजा का यश सवगे तक पहुंचता है ञौर वहां उस को गन्धवे “ अप्सरा राजषि कहकर गाते हैं _॥ टूसरा ब्राह्मण । हे गोतम क्या यही इन्द्र का सखा दुष्यन्त हे ॥ प० ब्रा० । हां यही हे ॥ टू? ब्रा०। तो फिर क्या आश्चये हे कि यह अकेला अपनी बांहों से जो नगर के राजद्वार की अगेत्ना के तुल्य हे समुद्र पयेन्‍्त सब पृथी -पर राज करता है ओर स्वगे में देवता इन्द्र के वज्ज को भूत्वम इसी क धनुष के प्रताप से ट्त्यां “ पर अपना विजय पाना बखानते हैं ॥ टो० ब्रा? । (राजा के निकट जाकर महाराज की जय हो ॥ दुष्प" । (प्रणाम करके) तुम्हारे आगमन का कारण जानने की हमारी इच्छा है ॥ दो ब्रा० । महाराज आश्रमवासियों ने यह जानकर कि जाप यहीं हो कुछ प्राथना की है ॥ टुष्य० । क्या अआज्ना की हे ॥ 30 +.] 8400१ ७,3, /2/$ दो० ब्रा० । हमारे गुरू कल ऋषि यहां नहों हैं" झोर राछ्षस आकर यज्ञ में विप् डालते हैं | इस ल्निये झाप सारथी समेत कुछ दिन इस आश्चम की रक्षा करो ॥ दुष्प० । हुसक्याकर यह तो मेरे ऊपर * बड़ा अनुमह किया ॥ माढ० । (सेन देक) अब तो तुम्हारी मनोकामना पूरी हुई ॥ दुष्खघ० । छुसक्माकर रेवतक तू जाकर सारथी को आज्ञा दे कि रथ लावे आर मेरा धनुष बाण भी त्नेता आवे ॥ द्वार० । जो ह्याज्ञा ॥ (बाहर गया) दो० ब्रा० । (थे रे) आप अगल्नों की रीति पर चलते हो _ । इस से यही उचित है। जोर यह तो प्रसिद्ध ही है कि शरणागत को अभय देने के निमिन्न पुरुवंशी सदा रणकड्टूण बांधे रहते हैं ॥ टुष्य० । प्रणाम करके ब्राह्णणो तुम आगे चतल्नो। में भी आया “ ॥ दो? ब्रा? । सदा जय रहे ॥ (दोनों गये) तु" । माढव्य क्या तेरी भी इच्छा शकुत्तत्ना के देखने की है ॥ माढ० । पहलत्ने तो कुछ चिन्ता भी न थी। परंतु जब से राष्यसों का नाम सुना है तब से उधर जाने को जी डरता है ॥ दुष्य* । डरता क्यों है। हमारे पास रहना ॥ माढ० । मुझे राष्तम से बचाने का आप को अवकाश भी मिल्नेगा ॥ (द्वारपाल आया) द्वा० । महाराज रथ आ गया हे ओर आप की माता की आज्ञा पाकर करभक टूत भी नगर से आया है ॥ टुष्प० । (सक्लार करके) क्या माता का भेजा करभक आया है । अच्छा । . उस को आने दो ॥ चद्वार०। जो अप्राज्ञा । (बाहर गया और करभक दूत को लिवा लाया) महाराज इधर 'हैं। संमख जा ॥ करभक। (रसाशक़् होक0 स्वामी की जय हो। माता ने यह ज्ाज्ञा की 24 88 ए४१'७॥.8. [4८% ॥]. है कि आप की आबेत्न बढ़ाने के निमिन्न आज से चोथे दिन झ्ाप की बरसगांठ का उत्सव होगा । उस समय जझञ्ञाप का आना भी आवश्य है ॥ टुष्प० । इधर तो तपस्वियों का काम उधर बड़ों की आज्ञा। इन में से कोई उल्लद्डन योग्य नहीं है। इस का क्या उपाय करूं ॥ माढ० । (कर झब तो तुम त्रिशदरः ” बनकर यहीं ठहरो “ ॥ टुष्पण । इस समय मरे चित्न को सच्चा असमझुस हें क्योंकि दोनों काये टूर टूर पर हैं ”। (सोचता हुआ) हे सखा तुकझ से भी तो माता पृ कहकर बोली हे“ । इस से तू ही नगर को जा और कह दे कि हम को तपस्वियों का काये करना अवश्य है ॥ माढ० । यह तो सब करूंगा। परंतु तुम कहीं ऐसा तो नहीं * समझे हो कि में राक्षसों से डर गया हूं ॥ दुषयघ० । लुसुकपाक0 नहीं। तू बड़ा वीर है। तू क्यों डरेगा ॥ माढ० । अब में राजा का छोटा भाई हूं या नहीं ॥ दुष्य० । हां ठीक है । इसी लिये तेरे साथ को ” भीड़ भाड़ भी चाहिये। इन सब को अपने साथ त्ने जा क्योंकि तपोवन में इतना ठोर भी नहीं है ॥ माढ०। तो तो“ में राजा ही हो गया ॥ तुष्प? । (आप ही आप) यह ब्राह्मण बड़ा चपत्न हे। कहीं ” हमारी लगन का व॒त्नान्त रनवास में न कह दे । अब इस को कुछ धोखा देना चाहिये । (भाठष्य का हाथ पकड़कर हे मिच में केवत्न ऋषियों का बड़प्पन रखन को इस तपोवन में जाऊंगा। यह तू निश्चय जान कि तपस्वी की कन्या शकुन्तत्ना के कारण नहीं जाता हूं। देख जो कन्या हरिणियों के साथ रही हे ओर शज्भार रस के मरम नहीं जानती है उस से क्योंकर मेरा मन लगेगा। उस का वृच्नान्त जो में ने तुकू से कहा था केवल मन बहल्लाने की बात थी ॥ 5८% व7.] 535ए ए ४१ ७५।,&. 25 माढ० । सत्य है । आप की जय रहे ॥ दु्घ । अच्छा हमारा संदेसा यथाथे भुगता दीजियो । में तपस्वियों की रश्या को जाता हू ॥ (सब बाहर गये) अइह्ढ ३ स्थान वन में तपस्वियों का झ्ाश्रम ॥ (कन्व का एक चेला आया) चेत्ना । (कुश हाथ में लिये अचम्भा सा कग्ता हुआ ) झ्पहा दुष्यन्त का कैसा जआातझू है कि जिस के चरण वन में ञझाते ही हमारे सब यज्ञकमे निजिधप्न होने लगे । बाण चढ़ाने की तो क्या चल्नी। प्रत्यज्चा की फटकार ओर धनुष की टंकार ही से हमारे सब क्लेश मिटा दिये। अब चल्नूं। मुक्ले ये दाभ वेटी पर बिछाने के लिये यज्ञकरनंवाले ब्राह्मणों को देने हैं ' । (फिरकर चौर नेषथ्य के पीछे देखकर हे प्रियेवदा किस के लिये उसीर का लेप ओर कमतल्न के पन्ने लिये जाती है । (कान लगाकर मुनता हुआ) क्या कहा ' कि धूप लगने से शकुन्तत्ना बड़त व्याकुल्न हो गई ह। उस के ल्रिये ठंढाई लिये जाती हूं । अच्छा तो दोड़ी जा। वह कन्या कन्व की ' प्राण है । में भी गोतमी के हाथ यज्ञमन्त्न का पढ़ा जत्न ” भेजूंगा ॥ (बाहर गया) (आसक्त मनुष्यों की सी दशा बनाये दुष्पन्‍्त आया) टुष्पन्त । तपस्या का प्रभाव में भत्नी भांति जानता हें। ओर यह भी समभ्ता हूं कि वह पराए बस है। परंतु अपने चित्चष को उस से हटाने की सामथ्ये नहीं रखता हूं। हे मन्‍्मथ मेरे ऊपर तुके क्यों ट्या नहीं आती है। देख तेरा नाम तो पुष्पशर है। तू ऐसा कठोर क्योंकर हुआ । (कुछ सोचकए हां इस का हेतु में ने जाना। महादेव के कोण की 26 840 095४१'५,8. [4८% ॥, कुछ आंच” तुकू में ओर तेरे बाणों में अब तक ऐसे बनी हे जेसे समुद्र में बडवानत्न “। ओर जो यह हेतु न होता तो तू भस्म हो चुका था। फिर वियोगियों के दृट्य को केसे जत्नाता । हे कुसुमायुध ल्लेही जनों को तू ओर चन्द्रमा दोनों विसासी हो । तेरे बाणों को फूल्ल कहना झोर सुधाकर की किरणों को शीतत्न बखानना ये दोनों बात हम वियोगियों के लिये असत्य दिखाई देती हैं । क्योंकि हम को कत्नानिधि आग बरसाता है ओर तेरे बाण वज सम “ त्वगते हैं । इस पर भी हे मीनकेतन “ तू मुझे प्यारा लगता है क्योंकि तू मुझे मृग- नयनी की सुध टिल्नाता है। हे महाबत्नी पत्च॒शर में ने तेरी इतनी स्तुति की । तुझे अब भी दया न आई । नहीं । मेरे वित्नाप ने तेरे बाणों की अनी सो गुणी पेनी ” कर दी है । हे मदन यह तुझे योग्य नहीं है कि मेरे दृट्य में गम्भीर घाव करने को अपने धनुष की प्रत्यज्ञवा कान तक खेंचे । (फरकर और देखकर! हाय जब यज्ञ समाप्त होगा तब आषियों से बिदा होकर में कहां अपने ठुखी जीव को बहत्नाऊंगा । (ढंढी श्ास छेकर) प्रिया के दर्शन विना” कोई मुझ्के धीरज देनेवाल्वा नहीं हे । अब उसी को दढूंढूं। (जप देखक0 इस घाम को प्यारी कहीं मात्रिनी के तट पर लताकुज्ञों मं सखियों के साथ बिताती होगी '। अब वहीं चल्बूं। (फरकर जौर देखकर मेरी जीवनमूत्न यहीं होकर गई हे क्योंकि जिन डाल्यों से फूल्न तोड़े हैं उन का दूध भी अभी नहीं सूखा है । (पवन का छगना प्रगठ करके! यहां पवन कमल्नों की सुगन्ध ल्थये ओर मात्िनी की शीतल्न तरज्ञों को छुये अदेह” की दहो देह को ” स्पशे करने आती है। (फरकर) कहीं इनन्‍्हों वेतों के त्वतामण्डत्न में यारी होगी । इन वुश्ों मंतो देखूं ॥ (फिरकर और चिन्न छगाकर देखकर) हप्रब मेरे नेच सफत्न हुए । मनभावती उस पटिया पर फूत्न बिछाये पोढ़ी हे” झोर सखी सेवा में खड़ी हैं । अब चाहो सो हो” इन के मते की बातें सुनूंगा ॥ (खड़ा होकर गहरी दृष्टि से / देखता हुआ) 4८7 .] &£86 7"'७.,8. 97 (दोनां सखियां समेत शकुन्तला दिखाई दी) दोनों सखी । (पंजा रूलतो हुईं) हे सखी शकुन्तत्ना हम कमल के पत्तों से बयार करती हैं। सो तेरे शरीर को त्वगती है या नहीं ॥ शकुन्तत्ना । अबुलाकर सखियो तुम क्यों मेरे लिये दुख सहती हो ॥ (दोनों सखी एक टूसरी को ओर देखती हई) टुष्य० । (आप ही चाप) हे इस की तो यह दशा हो रही है। क्या कारण इस ज्वर का है । धूप त्गी है या जेसा में समझता हूं । (सोच में डूबा हुआ) इस समय मेरे मन में केसे केसे संदेह उठते हं। प्यारी के दृटय में उसीर का लेप लगा है ओर हाथों में कमत्ननात्व का कक्कूण इतना ढीत्ना हो गया है । परंतु इस दुबेलता पर भी शरीर केसा रमणीय है ”। रतिपति और ग्रहपति इन दोनों की आंच समान है परंतु ग्रीष्प ऋतु के भानु का संताप तरुण स्त्रियों को इतना नहीं सता- ताहे॥ प्रियंवदा । (हौले अनमूषा झे) हे अनसूया तें ने भी देखा था या नहीं कि जब शकुत्तत्ना की टृष्टि उस राजधि पर पड़ी तब केसी ठगी सी” हो गई थो । कहीं वही रोग तो इसे नहीं है ॥ अनसूया । (होढे प्रयंदा रे) मेरे मन में भी यही भ्यासती है। चाहे सो हो इस से पूछना तो चाहिये”। (ए्ढे हे सखी शकुन्तत्ना में यह पूछती हूं तेरी यह दशा क्योंकर हुई हे ॥ शकु? । (फूछों की सेज्न से थोड़ी सी उठकर) सहेल्नियो तुम ही बताओ तुम इस का कारण क्या समक्री हो ॥ अन०। सखी हम तेरे हट्य की तो क्या जानें । परंतु जेसी दशा त्वगन लगे मनुष्यों की कहानियों में सुनी है वेसी तेरी ” दिखाई देती है। तू ही कह दे तुके क्या रोग है क्योंकि जब तक मरम न जाने वेद्य आषधि भी नहीं कर सकता है ॥ दुष्प०। (हैले आप ही जाए मेरे मन में भी यही भी*॥ 82 28 85 07४१'५॥.४. [40० 7,. शकु० । होले चाप ही आप) मेरी बिथा तो भारी है परंतु इस का कारण तुरंत ही न कह टूंगी ॥ प्रि०। हे शकुन्तत्ना यह अनसूया भत्नी कहती है। तू अपने रोग को बढ़ने मत दे | क्योंकि दिन पर दिन तू दुबत्नी होती जाती हे “। अब केवत्न स्वरूप ही रह गया हे ॥ टुष्प० । (हौले आप ही आप) प्रियंवदा ने सत्य कहा । इस के कपील्न सूख गये हैं झज्भ शिथित्न हो गये हें कटि अति छीन पड़ गई है“ कंधे कूक आये हैं रह्ढ पीला पड़ गया है । इस से निश्चय है कि यह मदनाग्नि में कृलसकर ऐेसी हो गई हे जेसी त्वपट की मारी चमेत्नी की त्वता। परंतु मेरे मन को ञब भी सजी बनी हे“ ॥ शकु० । (जाह करके) सखी तुम से न कहंगी। किस से कहूंगी । तुम ही को दुख टूंगी ॥ प्रि०्। यारी इसी से तो हम हठ करके पृछती हैं कि हितू जनों के बटाने से दुख घटता है ॥ दुष्प० । (होले आप ही आप) अब सुख ठुख की साकिन सखियों के पूछने से” यह अपने मन की सब बात कह देगी। इस की आंखों का ठगा में हुं” । सो मेरी भी यही चाह है कि कब इस के मुख से उत्तर सुनूं ॥ शकु० । हे सखी जब से मेरे नेतरों के सामने इस तपोवन का रखवाला वह चतुर राजधि झाया तभी से (इतना कह छक्जित होकर चुप रह गई) दोनों सखी । कहे जा “ ॥ शकु०। तब से मेरा मन उस के बस होकर “ इस दशा को पहुंचा है ॥ अन० । चत्नो । यह भी अच्छा हुआ कि जो तेरे योग्य था उसी से आंख त्नगी ॥ प्रिग्/ यह कब हो सकता हे कि निमेत्न नदी समुद्र को छोड़ ताल में गिरे अथवा सुन्दर त्वता आम को छोड़ दूसरे वृश्ष से त्निपटे ॥ 4८०7 .] 6437 ए7४१५,8. 29 दुष्प० । (हुवे से आप ही जाप) जो में सुना चाहता था सो ई प्रिया के मुख से सुन ल्िया। मेरी बिया का कारण मनन्‍्मथ था। उसी ने उस बिथा को टूर किया जैसे सूये का तेज सरीष्स में पहत्ने जीव जन्तु को तपाता है फिर मेंह बरसाकर सुखकारी होता है ॥ शकु०। जो कुछ दोष न समभो तो ऐसा उपाय करो जिस से वह राजधि फिर मित्ने । ओर जो तुम ऐसा न करना चाहो तो मुक़े तिलाह्त्नी दो “ ॥ टुष्य० । (आप ही आपे इस वचन से मेरा सब संशय मिट गया ॥ प्रि० । (होले अनमूण से) हे सखी इस रोग की ओषधि मित्ननी दुल्ेभ टिखाई देती है। ओर रोग ऐसा कठिन है कि इस में विलख होना न चाहिये । इस से जहां तक बुद्धि चल्न सके” उपाय करो। लगन तो इस की बड़ाई के योग्य हे क्योंकि वह भी पुरुवंशभूषण है ॥ अन०। (होले) सत्य है। परंतु कोन सा यल है जिस से ” यह रीग तुरंत मिटे झआऔर उपाय प्रगट भी न हो ॥ प्रि०। (होले अनम्पा से) उपाय का गुप्त रखना तो कुछ कठिन नहीं है परंतु तुरंत मित्नना बह़त दुल्बेभ है ॥ दुष्य० । (आप ही चाप) चन्द्रमा विशाखा नक्षत्र में झा जाय तो क्या आश्चये हे ॥ अप्रन० । (होल प्रियंबदा से) क्यों ॥ प्रि० । (हौले अनसया से) जिस समय प्रथम ही उस राजधि ने इस को ल्ेह की टृष्टि से देखा में जान गई थी कि उस का भी मन इस पर आसक्त हुआ । अब सुनती हूं कि वह भी शेसा टुबेल ओर पीला पड़ गया है” मानो इस के अनुराग में उसे रात रात भर जागते बीता है ॥ टुष्य० । आप ही जाप) हो तो ऐसा ही गया हूं” । सारी सारी रात संताप के आंसुओं से भीगकर इस भुजबन्द के रल फीके पड़ गये हैं। 80 840 0४१५॥.8 , [40% 7, जोर यह इतना ढीला हो गया है कि सरककर वार वार पहुंचे पर गिरता है ॥ प्रि०। हे हे सखी अनसूया मेरे विचार में यह आता हैं कि एक प्रंतिपत्र त्निखंं ओर फूल्नों में छुपाकर प्रसाद के मिस से राजा को दूं॥ अन० । सखी यह उपाय बहुत उन्नम है। परंतु शकुन्तत्ना से भी पूछ त्नो वह क्या कहती है ॥ शक॒० | उस उपाय का परिणाम मुक्के सोच लेने दो ॥ प्रिग्। जेसी तेरी दशा हो रही है वेसा ही कोई छन्‍्द भी बना दे॥ शक” । सखी में छन्‍्द तो रचूंगी । परंतु डरती हूं कि कहीं वह राजा अपमान करके फेर न दे ॥ टुष्य । (आप ही आप) जिस के अपमान से तू डरती है सो हे प्राणयारी यह ” तेरे मिलने को तरसता है। जो कोई लक्ष्मी मिलन ” की चाह करे उसे चाहे” लघ्मी न भी मित्ने परंतु जिस को लघ््मी चाहे वह क्योंकर न मिले। हे सुन्दरी जिस से आदर मिलने में तुरे संदेह है सो ई यह “ प्रीति लगाये तेरे संमुख खड़ा हे। रत्न किप्ती को ढूंढने नहीं जाता है। रल ही को सब ढूंढते हैं ॥ अन० । सखी तू अपने गुणों को घटाकर” कहती है। नहीं तो“। ऐेसा मूखे कोन होगा जो सूथे का ताप मिटानेवात्नी शीतत्न शरट्‌- चांदनी को रोकने के लिये अपने सिर पर कपड़ा तान “ ॥ शकु० । लुरुकाकर) में उसी बात के सोच विचार में हूं जो तुम ने कही है ॥ (सोचने लगी) टुष्य० । (आप ही आप) प्यारी को ल्लोचन भर” देखने का यह अवसर अच्छा हे। इस समय इहछनन्‍्द बनाने में इस की चढ़ी भोंह केसी शोभाय- मान है और पुत्नकित कपोलों से प्रीति केसी स्पष्ट ट्रसाती है ॥ शकु० । सखी छन्द तो में ने बना त्विया। परंतु लिखने की सामग्री नहीं है ॥ 4८५ व.] 854 ए ४१ ५॥.,8 , 8] प्रिग्। तू पढ़ती जा “। में इस को मत्न कमल के पत्ते पर अपने नखों से त्निख लूंगी ॥ शकु० । सखियो सुनो । इस छन्द में अथे बना या नहीं ॥ दोनों सखी । बांच ॥ शकु० । (बचत हुई) दोहा तो मन की जानति नहीं अहो मीत सुखंदेत । पे मो मन को करत है मेन महाबेचेन ॥ सोरठा लाग्यो तो सों नेह रेन दिना कत्न ना परे। प्रेम तपावत देह तन मन अपनो दे चुकी ॥ दुष्य० | (ऋढ पढ आगे बढ़कर उसी हन्द में पढ़ता हुआ) दोहा केवत्न तो हि तपावही मदन अहो सुकुमारि। भस्म करत पे मो हियो तू चित देखि बिचारि ॥ सोरठ भानु मन्द कर देत केवत्न गंधि कमोदिनि हि। पे शशिमण्डत्न स्वेत होत प्रात के ट्रस तें॥ दो" सखी । (हपे ?े) तुम भत्ने आये। हमारी सखी का मनोरथ पूरा हुच्चा ॥ (शकनला आदर देने को उठने की इच्छा करती हुई) दुष्य० । रहो रहो । मेरे लिये क्यों परिश्रम करती हो । तुम्हारा यह ताप का” सताया कोमल शरीर जो सेज के फूज्ञों को कुम्हतल्नाता है आर ये भुजा जिन में कमल के मुरभकाये कक्ूणों की सुगन्‍्ध आती हे इतना कष्ट सहने योग्य नहीं है ॥ शकु०। (आप हो आप) अरे मन तू अब तो धीरज धर ॥ 82 850 0४१७.,8 [4०% व[, अन०। महाराज आप भी उसी चटान पे बिराजिये जहां शकुन्तत्ना ह्टे ॥ (शकुन्तला ने जगह दी ”) टुष्य० । बैठक कहो तुम्हारी सखी के शरीर का कुछ ताप घटा ॥ दो? सखी । (सके अभी झोषधि मित्नी है। कब घटेगा ॥ (शकुकतला लज्तित हो गई) दुष्पय० । (आप ही आप) यह केवत्न अपने रूप ही के बत्म से मन को बस नहीं करती है। इस का लज्जित होना भी चित्न को ठगे ” लेता है । देखो अपनी आंखों के ताड़ित किये ” कमतल की पखुरियों को केसे अनोखेपन से गिन रही है ॥ शकु०। प्रियंवदा मेरे निकट आ ॥ प्रि० । (पास जाकर) हप्राई॥ शकु० । राजा से यों कहो . . . . ॥ (कान में कुछ कहती हुई) प्रि०्। हे बड़भागी तुम से शकुन्तत्ना बिनती करती है कि प्रथम मित्लाप को भूल मत जाना “ ॥ (शकुलला के) महाराज भी यही कहते हैं ॥ शकु०। महाराज जेसे रूपवान हैं वेसे ही चतुर भी हैं ॥ प्रि०। हे सज्जन यद्यपि तुम्हारी दोनों की ” परस्पर प्रीति प्रगट है परंतु इस सखी का ख्लेह मुझ से फिर कुछ कहत्नाया चाहता है ॥ दुष्य० । सुन्दरी जो कुछ कहा चाहती हो निधड़क कहो । छुपाओ मत क्योंकि कहने को मन में आवे झोर कहा न जाय तो चित्न को खेद करता है ॥ प्रि०। प्रजा को * दुख हो तो राजा का धमे है कि उस दुख को मिटावें ॥ दुष्प० । सत्य है। इस से बड़ा कोई धमे राजा के त्रिये नहीं है ॥ प्रि०्। हमारी सखी को तुम्हारी त्वगन ने इस दशा को पहुंचा दिया है। अब तुम ही इस योग्य हो कि इस को जीवदान दो “ ॥ दुष्घ०। हे सुन्दरी प्रीति तो हमारी परस्पर है। परंतु इस में सब विधि क॒ताथे में ही हू“ ॥ 46% .] 840 07९१'७,4. 88 शकु० । (ुसक्वाकर) राजा को क्यों यहां बिल्माती हो । उन का मन रनवास में धरा होगा ॥ दुघ० । मेरे मन को हे मृगनयनी तुझ से अधिक कोई पारा नहीं है। अब त्‌ ऐसे वचन कहकर ” क्यों मेरे हटय को घायत्न करती है ॥ अन०। (हसकर) हे सज्जन हम यह सनते हैं कि राजा बह़त रानियों के षारे होते हैं। तुम हमारी सखी का ऐसा निबाह करना” जिस से हम को क्वेश न पहुंचे ॥ दुष्य० । हे सुन्दरी अधिक क्या कह *। मेरे रनवास में चाहे जितनी * रानी हों मुक्ले दो ही वस्तु संसार में यारी होंगी एक पृथ्री दूसरी तुम्हारी सखी ॥ दोनों सखी । तो हब हमारी चिन्ता मिटी ॥ प्रि० । '्लेन देकर हौले अनसूया से) देख। अब शकुन्तत्ना का जी केसा हरा होता है जैसे ल्पट की सताई मोरनी वषेा के बाटल आने ओर शीतत्न पवन ” लगने से चेतन्य हो जाती है ॥ शकु० । ६ोनें सलियों से) में ने तुम से बड़े कवोर वचन कहे हैं। सो यह “ अपराध छ्वमा करना ॥ प्रिग्। हम ने सीख ही ऐसी दी थी जिस से कड़े वचन सुनने पढ़ें *। परंतु राजा से छ्षमा मांगो उन्हीं । का अपमान हुआ होगा ॥ शकु० । महाराज में बिनती करती हं कि जो कुछ कहनी न कहनी बात * मेरे मुख से आप के संमुख अथवा पीछे निकली हों यह अपराध छामा किया जाय । (ले ज्यों ) सखियो तुम भी मेरे लिये कुछ कहो ॥ दुष्य० । हे पद्मिनी कमा में तब करूंगा जब तू फूल्मों की आधी सेज पर मुझे भी निज जन जान” आसन देगी ॥ दोनों सखी। हां हां सच्ची ” तो है। थोड़ी सी जगह राजा को भी दे इन का मन संतुष्ट हो ॥ प्र 84 64 एए१'७.4, [46% 7वा, शकु। (रिस सी होकर भ्रियंददा के) चुप रहो चज्ब॒त्न | तुम मुझ से इस दशा में भी हंसी करती हो ॥ ... प्रि०। (अनमूया की ओर देखकर) हे अनसूया हरिण का बच्चा अपनी मा को ढूंढता फिरता है। चत्नों उसे मित्ना दें ॥ (दोनों चली) शकु० । सखियो में अकेली रही जाती हूं। तुम में से एक तो मेरें पास रहो। यहां कोई नहीं है ॥ दोनों सखी । 'ुसुखाक0 अकेत्नी क्यों हे। जो सब पृथी का रखवाला है सो तो तेरे पास बेठा है ॥ (दोनों गई) शकु० । हाय मुक्के अकेली छोड़कर तुम से केसे जाते बनता हे ॥ दुध० । यारी कुछ चिन्ता मत कर। में तेरा टहललुआ बना हूं। जो कुछ कहना” हो सो कह । आज्ञा दे तो शीतत्न कमल के पंखे से पवन भलनूं। कहे कोमल पेरों को अझ्ू में रखकर धीरे धीरे दाबूं ॥ शकु० । में बड़ों का अपराध न ल्लूंगी ” ॥ (उठकर चलने को मन किया) दुष्प० । अभी टुपहरी कड़ी पड़ती हे ओर तेरे शरीर की यह दशा है। ऐसे में ” इस शीतत्न सेज को जिस पर कमल के ट्ल्न तेरे हिये को दाब रहे हैं छोड़कर कठिन घूप केसे सहेगी ॥ (खेंचकर बिठाने लगा) शक" । छोड़ो छोड़ो । में स्वतन्न्न नहीं हूं" । ये दोनों सहेत्ली मेरे साथ इसी लिये थीं कि कभी टूर न हों। परंतु क्या करूं ॥ टुष्प? । (आप ही आप) कहों रिस न हो जाय ॥ शकु० । 'जुनकए तुम्हारा कुछ दोष नहों है। अपने भाग्य का दोष है ॥ टुष्प* । ऐसे अच्छे भाग्य को क्यों दोष देती है ॥ शकु० । दोष क्यों न दूं । अच्छे भाग्य होते तो क्या मेरे मन को पराए गुणों पर ल्वुभाकर बेबस ” कर देते ॥ (चल दी “) टुष्प० । (आप ही आए) स्त्री को इतनी सामथ्ये हे कि विलख करके काम को मन ही में जत्ना दे। परंतु पुरुष काम के ताप से आप जलता है। अनबन मं अपने सुख को केस पाऊं॥ (शकन्तला के निकट ज्ञाकर खच्वल पकडा) #८7 .] 84 ए४१५॥,8. 35 शकु० । फिय्करे छोड़ो छोड़ो । हे पुरुवंशी नीति का पात्नन करो । यद्यपि में काम से पीड़ित हूं तो भी पराधीन " हू । देखो आश्रम में तपसवी ल्लोग इधर उधर फिरते हैं ॥ तुष्प० । हे कामिनी गुरुजनों का कुछ भय मत कर । काहे से कि” कन्‍्व धमे को जानते हैं । तुझे दोष न देंगे । बहतेरी ऋषि कन्या गान्धवे ” रीति से ब्याही गई हं। उन के मा बाप ने कुछ दोष नहीं त्वगाया ॥ शकु० । अज्बल्न छोड़ दो । मं अपनी सखियों से कुछ बात कह आऊं। (बोड़ी दूर गई फिर पीछे को देखकर हे पुरूवंशी यद्यपि तुम्हारी इच्छा पूरी नहीं हुई है और में ने केवल छाणमात्र “ बातें ही कर लेने टी हैं तो भी शकुन्तत्ना को भूल मत जाना “ ॥ । दुष्घ०। हे सुन्दरी तू चाहे जितनी टूर जा” मेरे हृदय से न्‍्यारी न होगी । जैसे वृक्ष की छाया चाहे जितनी बढ़े जड़ को नहीं छोड़- ती है॥ शकु० । (कुच चलकर जाप ही आप) क्या करूं। इस ने इतनी बिनती की है कि मेरे पेर आगे को नहीं पड़ते हें ”। अब वृश्यों की ओट ” बेठकर देखूं तो यह मुन्झे कैसा चाहता हैं “॥ (वृष्ों में बैठ गई) दुष्प० । (आप ही आए हाय मुझ लेही को छोड़कर यह ऐेसी जाती है मानो ' कभी पहचान ही न थी । शरीर की ” तो कोमल है परंतु मन की ” बड़ी निदुर है । जेसे सिरस का फून तो नरम होता है परंतु डाली कठोर होती है ॥ शकु० । (आप ही जाप) यह सुनकर अब मुक्‌ में चलने की सामथ्ये नहीं रही ॥ टुष्घ०। (जाप ही आप) अब प्यारी के बिना इस सूने ठोर में क्या करूंगा। (चल दिया फिर जागे देखकर बोला) अप्रह्ा अब तो कुछ ठहरूंगा | क्योंकि उस के हाथ से गिरी यह कमतल्ननाल की पहुंची जिस में उशीर की सुगन्ध हू 86 840 0४१'५.8, [4०० 7, आती है “ जझ्चानक मेरे सामने ऐंसी झ्ाई हे मानो पेरों को बेड़ी जप्राई ॥ (बड़े चाव से पहुंची को उठा लिया) शक (अपनी बांह को देखकर आप ही आप) हाय में ऐसी टुबेत् हो गई हर कि बांह से कट्टण गिरता भी न जाना टुष्य० । (कक्कूण को उठाकर ओर छाती से लगाकर आप ही आप) उप्रहा केंसा सख इस के छूने से ढदय को होता है। हे पारी इस कझ्कण ने म॒झे धीरज दिया है जिस के देने से त नट गई शकु० । (आप ही आप) झआब मुझ से यहां नहीं रहा जाता ” । चल्न॑। इसी मिस से दिखाई टूं॥ (हौछे हौछे उस की ओर ज्ञाती हुई) टुष्प० । (हे से) अहा इन नेचों को फिर भी जीवनमरि का दर्शन हुआ । यह भी भाग्य में लिखा था कि विलाप के पीछे फिर देव कुछ सुख देगा। जेसे यासे पपीहा की टेर सुनके घटा पानी देती है ॥ शकु० । (राजा के आगे खड्टी होक) हे पुरुवंशी जब में आधी दूर निकल गई तब बांह से गिरे कह्कण की सध आाई । मेरा हतय साख भरता है कि तम ही ने लिया होगा। हे महाभाग में बिनती करती हूं मेरा कह्कूण दे दो । नहीं तो मुनि ल्लोगों में दोनों का चवाव होगा टुष्प९ । एक भांति दूंगा शकु० । केसे दोगे ॥ दुष्य* | जो तू मुझे बांह में पहना देने दे ॥ शकु० । अच्छा । क्या डर है ॥ (नगीच गई) दुष्प० । तो आओ । इस चटान पर बेठें। दोनों बैठे । शकुका का हाथ लेकर जहा इस बांह में फिर नवीन लता के समान पहला बल्न आर रूप झ्ाया । अथवा इस की दशा कामदेव की सी है कि शिव- ट्रोह की ज्वाला से भस्म होकर फिर देवताओं के अमृत बरसाने से सजीव हुआ ॥ शकु०। (राजा का हाथ मसककर) हे आयेपुत्र वेग पहनाओो ॥ 40०५ व.] 8607 ए४१'७॥,8. 37 दुष्य० । (आप ही जाप) अब मुफे विश्वास हुआ ” । क्योंकि आयेपुत्र शब्ट्‌ केवतल्न पति के लिये बोला जाता है। ० प्यारी यह कझक्ूण तुम्हारी बांह में ठीक न आया । ल्लाओ ” इसे फिरकर बनावें ॥ शकु० । (हंसकर) जेसे तुम्हारी इच्छा हो ॥ तुष्प० । (कुछ विकूख करके) यह अड्डेचन्ट्र हे कि शोभा पाने के लिये जआ्ञाकाश को छोड़ तेरी बांह पर कटड्कूण बनने आया है ॥ शकु० | मुझे तो चन्द्रमा सूकता नहीं हे । मेरे कानों पर कमल के फूल्ल हैं इन से पराग उड़कर आंखों में पड़ा है। इस से दृष्टि इस समय मंदी हो रही है ॥ टुष्य० । (हंसकर) कहे तो _ मुख से फूंककर आंखों को निमेत्न कर दूं ॥ शकु"। यह तो बड़ी कृपा हो। परंतु मुझे तुम्हारा विश्वास नहीं है *॥ दुष्य०। कभी नया सेवक स्वामी की आज्ञा से कुछ, अधिक करते भी सुना है “ ॥ शकु० । तुम्हारी यहीं लुरखुरी की बातें तो विश्वास नहीं होने देतीं । (धरे से फूंक मारी) बस करो । अब मेरी दृष्टि ज्यों की त्यों हो गई । अब में ल्जाती हूं कि मुझ में कोई गुण ऐसा नहीं हे जिस से आप के इस अनुयह का पत्नटा दे सकूं॥ तुष्प० । इस से बड़ा ओर क्या पत्नटा होगा कि तू ने अपने होंठों का सोरभ मुझे लेने दिया। क्योंकि भोंरा कमत्न की वासना ही से संतुष्ट हो जाता है ॥ (नेषष्य मे) हे चकवी अब चकतवे से ” न्‍्यारी हो । रात आई॥ शकु० । (कान रूगाकर और सदपटाकर) हे महाराजकुमार निश्चय मेरे शरीर का वृत्ान्त पूछने को कन्‍्व की छोटी बहन गोतमी आती है । तुम वृक्ष की आड़ में हो जाओ ॥ टुष्य" । अच्छा । यही करूंगा ॥ (चला गया) (हाथ में कमण्डल लिये गौतमी आई) 38 5400४१५.8. [4०7 ॥, * गोतमी ॥ (शक॒लला को ओर झखत्ति चिन्ता से . देखकर) पुत्री तरे त्निये मन्त्र पढ़ा जल्न त्नाई हं। क्या तू यहां अकेत्नी ही है | सहेत्नी कहां गई ॥ शकु० । प्रियंबदा ओर अनसूया दोनों अभी नदी को गई हैं ॥ गो०। (जल के छींडे देकर”) शकुन्तत्ना तेरे शरीर का ताप कुछ घटा कि नहीं ॥ (नाइी देखी “) न्‍ शकु० । हां कछ घटा है ॥ गो? । इस कुश के जल से तेरा शरीर निरोग हो जायगा । कुछ भय मत कर । परंतु अब संध्या हुई घर को चत्न ॥ शक० । (होले से उठकर आप ही आप) हे मन तेरी आकांछा परी हो गई तो भी चिन्ता न मिटी । इस का क्या उपाय होगा । (थोड़ी दूर चक्कर खड्टी हु) हे संतापहरनेवातल्वी लताओ में तुम से बिनती करती हूं कि कभी फिर भी सख टिखाना 72 । (गोतमी के साथ चलती हुई) दुष्पय० । (उसो स्थान पर आऊाकर और गहरी सांस भरकर) सत्य हे | जिस बात का मनोरथ क्या जाय उस में विप्न अवश्य होता है । (चारों ओर देखकर हाय चटान पर यही पूल्नों की सेज हे जिस पर वह पोढ़ी थी। यही कमत्न का पच्चा हे जिस पर पारी ने लेहपच ल्निखा था। यह उस की बांह से गिरा कमत्नों का कह्ूकण है। यद्यपि यह वेतलता सूनी है तो भी इन चिहष्टों को देख देख मुझ से छोड़ी नहीं जाती ”। मुक्के धिक्कार है कि पारी से मिल्लकर फिर उस के वियोग में समय व्यतीत करता हूं । जो एक बेर फिर उस लताभवन में वह मनभावती आवे तो कभी बिछुरने न टूं। सुख की घड़ी बड़े श्रम से मित्वती है। मेरा यह मूखे मन अब तो ऐसा प्रण करता है परंतु षारी के संमुख कायर हो जाता है ॥ (नेषष्य में) हे राजा अब हमारा संध्या के यज्ञकमे का समय हुआ आर मांसाहारी राक्षसों की छाया हताशन की वेदी पर सांक के मेघ के “ फिरती दिखाई देती है । इस से भय उपजा है ॥ दुष्प० । हे तपस्वियो भयभीत मत हो । में झ्ञाया ॥ (बाहर गया) 4०7 0.] 550 0]४१७॥,4, 89 ज्डः ४ स्थान तपोवन ॥ !(दोनो सखी फूल बोनती आई) अनसूया । हे सखी प्रियंवटा हमारी सहेतल्ली शकुन्तत्ना का गान्धवे विवाह हुआ । झोर पति भी उसी के समान मिलत्ना । इस से हमारे मन को सुख हुआ | परंतु फिर भी चिन्ता न सिटी ॥ प्रियंबदा । सखी ओर क्या चिन्ता रह गई ॥ अन० । ञ्राज वह राजधि तपस्वियों का यज्ञ पूरा कराकर अपनी राजधानी हस्तिनापुर को बिदा हुआ है । वहां रनवास में पहुंचकर जाने यहां की सध रहेगी या न रहेगी ॥ प्रिग्। इस की कुछ चिन्ता मत करो । ऐसे गुणवान मनुषय कभी निलेज्ज नहीं होते हैं। अब चिन्ता की बात यह है कि न जानें पिता कन्व इस वृज्ञान्त को सुनकर क्या कहेंगे ॥ अन० । मेरे मन में तो यह भ्यासती है कि वे इस वृत्नान्त से प्रसन्न होंगे ॥ प्रि० । क्यों ॥ अन० । इस लिये कि उन का संकल्प था कि यह कन्या किसी गुण- वान को दें । सो देव ने वेसा ही योग मिलना दिया। फिर वे क्यों अप्रसन्तन होंगे ॥ प्रि० । सत्य है। (फूलों के ठोकरो को देखकर! हे सखी जितने फूल्न पूजा के लिये चाहियें' उतने तो बीन चुकों ॥ अन० । अब थोड़े से शकुन्तत्ना से गोरिपूजा करने के लिये ओर बीन लें ॥ प्रि० । अच्छा ॥ (दोनों फूछ बौनने गो) (नेषष्य में) में आता हूं ॥ 40 8437 05१'७॥.,8, [4८% ॥ए. आन० । (कान लगाकर! हे सखी णेसा बोल जान पड़ता है मानो कोई जआतिथि आश्रम में आया हे ॥ प्रि०। क्या डर है। शकुन्तत्ना वहां बनी है ॥ अन० । शकुन्तत्ना हे तो । परंतु उस का मन ठिकाने नहीं है। चत्नो । इतने ही फूल्ल बहुत हैं '॥ (चल दी) (नेषष्य में) हे अतिथि का निराट्रकरनेवात्नी में तुके आप देता हूं। कि जा । जिस पुरुष के ध्यान में तू ऐसी मग्न बेठी हे कि तें ने मुझ तपस्वी को भी आया न जाना वही तेरा निरादर करेगा। ओर फिए तू उप्त के संमुख होकर अपनी सुध ट्ल्नावेगी तो भी वह तुरे ऐसा भूल जायगा जेसा कोई उन्मच मनुष्य चेतन्य होकर उन्मन्नता की कही" बातों को भूत्न जाता है ॥ प्रि" । हाय हाय बुरो डुई । किसी तपस्वी का अपराध बेसुधी में शकुन्तत्ना से बना “ ॥ ज्पन० । (आगे देखकर ठीक है। तभी / रिसभरे ठुवासा वेग वेग ल्नोटे जाते हैं ॥ प्रिग्;4 इन को छोड़ और किसी को रेसी सामथ्ये नहीं हे कि अपराधी को श्राप से भस्म कर दे । हे अनसूया तू पेरों पड़कर जैसे बने तेसे इन को मना त्वा । तब तक में उन के लिये अधे संजोती हूं ॥ आत०। में जाती हूं ॥ प्रि०। (दौड़कर चली इस से पांव रपढ गया) हाय उतावत्नी होकर ह:। ने फूल्नों की टोकरी गिराई। अब कहों ऐसा न हो कि ' पूजा उल्लद्न हो जाय ॥ (फूछ बीनने छगी) (अनमया फिर खाई) आअन० । हे सखी इन का स्वभाव बहत टेढ़ा हे। ओर क्रोध इतना है कि किसी भांति मनाये नहीं मानते हैं | पंरतु तौ भी में ने कुछ सीधे कर लिये ॥ +6फ ९.] 55700 0४१५।.8. 4] प्रिग्, इन का थोड़ा सीधा होना भी बड़त है। तुम यह कहो कि केसे मने ॥ ज्पन० । जब किसी भांति न माने तब में ने परों में गिरकर यह बिनती की कि हे महापुरूष त्‌म को इस ने आगे नहीं देखा था। इस से तुम्हारे प्रभाव को नहीं जानती थी । अब इस कन्या का आपराध छ्मा करो ॥ प्रिग्। तब क्या कहा ॥ अन० | तब बोल्ने कि मेरा श्राप भूठा नहीं होता है। परंतु जब इस का पति अपनी मुदरी को देखेगा तब श्राप मिट जायगा । यह कहकर अन्तध्यान हो गये ॥ प्रि०ग्। तो कुछ आशा है। क्योंकि जब वह राजाधषि चलने को इुआ था तब अपनी अंगूठी जिस में उस का नाम खुदा था शकुन्तला की उंगली में पहना दी थी ओर उस को तुरंत पहचान भी लेगा । यही शकुन्तत्ना के लिये अच्छा उपाय हे ॥ अन० | आओ | अब चलें। देवियों से प्राथेना करें ॥ प्रिग्। हे अनसूया देख। बाएं कर पर कपोल्न धरे पति के वियोग में पारी सखी केसी चित्र सी बन रही है । टूसरे की तो क्या चत्नाई। इसे अपनी भी सुध नहीं है ॥ अन० । हे प्रियंवदा यह श्राप की बात हम ही तुम जानें। शकुन्तत्ना को मत सुनाओ। क्येंकि उस का स्वभाव कोमल बहुत “ हे ॥ प्रिग्। ऐसा कोन होगा जो मल्लिका की लहतलनही ल्वता पर तत्ना पानी छिड़के ॥ (दोनों गईं) 4 (कन्व का रक चेला आया) चेल्वा । महात्मा कन्‍्व कऋ्षि प्रभासतीथे से आ गये हैं। ओर मुझे आज्ञा दी हे कि देख आा रात कितनी रही है । सो में रात देखने को बाहर आ्ञाया कू। (इधर उधर फिरकर आकाश को ओ ओर देखता हुआ) उप्रहा यह पं 42 8.0 0४१'७.8. [46०7 ए, तो प्रभात हो गया। चन्द्रमा ओर सूये इस संसार की संपत्चि विपन्नि की अनित्यता का कैसा / अनुमान कराते हैं ।आषधिपति तो इस समय अस्त होने पर है झोर यहपति अरूण “ को सारथी किये ” उदय हुआ चाहता है”। उन की शोभा उटय अस्त पर बढ़ घट होती है” । ण्से ही सज्जन मनुष्य सुख दुख में धीरज रखते हैं । इन की घटती बढ़ती इस संसार के उतार चढ़ाव का दृष्टान्‍्त हे । वही कमोटिनी जिस की शोभा की बड़ाई होती थी अब चन्द्रास्त में दृष्टि को आनन्द नहीं देती । केवल सुगन्ध रह गई है। ओर ऐसी कुम्हल्ला गई है जेसे अपने पारे के वियोग में अबत्नाजन ” व्यथित होती हैं । देखो बेर के पन्नों पर ओस की बूंदों को अरूण केसी ” शोभा देता है । दाभ की कुटी से मोर निट्रा छोड़ छोड़ बाहर निकलते हैं । यज्ञस्थानों से भाग भागकर मृग टीले पर खड़े केसे ” ऐंड्राते हैं । वही चन्द्रमा जो गिरिराज सुमेरू के सिर पर पांव धरता ' झोर अन्धकार को मिटाता” हुआ मध्या- काश में विष्णधाम तक चढ़ गया था अब अपना तेज गंवाकर नीचे को जाता है। ऐसे ही इस संसार में बड़े मनुष्य अति श्रम से अपनी कामना को प्राप्त होते हें फिर तुरंत उतरना पड़ता है ॥ (सनसूया कुछ बिचारती हुई आई) झआन०। (आप ही जाप) यद्यपि शकुन्तत्ता तपोवन में इतनी बड़ी हुई हे” ओर इन्द्रियों का सुख नहीं जाना है तो भी लगन ने यह दशा उस की” कर दी है। हाय राजा ने केसी अनीति इस के साथ की हे ॥ चेत्ना। (आप ही आप) जब होम का समय हुआ | गुरू से चल्नकर कहना चाहिये” ॥ (बाहर गया) अन० । रेन बीत गई। में अभी सोते से भी नहीं उठी हं। ओर जो उठी भी होती तो क्या करती | हाथ पेर तो कहने ही में नहीं ब् है । झब निद्देई कामदेव का मनोरथ पूरा हइआा कि उस ने एक ८7 7.] 5470 ए१५.8. 48 मिथ्यावादी राजा के बस में हमारी सीधी सच्ची सखी को डालकर इस दशा को पहुंचाया है। ओर जो यह फल्न टुवासा के श्राप का ” नहीं है तो क्या हेतु है कि धमात्मा राजा ने ऐसे वचन देकर अब तक संदेसा भी न भेजा । अब यह उचित हे या नहीं कि उस मुदरी “ को हम राजा के पास भेजें । अथवा ओर भी कोई उपाय हे जिस से हमारो णषारी सखी का विरह मिटे । उस का तौ कुछ अपराध नहीं है। पिता कनन्‍्व तीथे करके आ गये । परंतु उन से यह बात कहने को कि शकत्तत्ना का विवाह राजा दुष्यन्‍्त से हो गया हे ओर गभेवती भी है मेरा हियाव नहीं पड़ता है । हे देव अब क्या उपाय करें जिस से शकुन्तत्ना की बिथा टूर हो ॥ (प्रियंवदा आई) प्रि०्। अनसूया चल्नो | शकुन्तत्ना की बिदा का उपचार करें ॥ अन० । (जाथये से) सखी तू क्या कहती हे ॥ प्रि०्। अभी में शकुन्तल्ला से यह बात पूछने गई थी कि रात को चेन से सोई या नहीं . . . . ॥ आअन० | सो तब ॥ प्रिग। सो वह तो सिर भूकाये बेटी थी। इतने में पिता कन्व निकट आकर उस से मित्ने “ जोर यह शुभ वचन बोले कि हे पुत्री बड़े मड्जल्न की बात है कि आज प्रातकातल्न जब ब्राह्मण ने अग्निकुणड में आइति दी तब यग्मपि यज्ञ के धूएं से उस की टृष्टि धुंधुली हो रही थी तो भी आइहति अग्नि के बीच“ में पड़ी । इस लिये ञब तुस को में अधिक दुख में न रकक्‍्ख्‌ंगा । आज तुम्हारी बिदा इस कुटी से उस राजा के रनवास को कर टूंगा जिस ने तुम्हारा पाणिय्ंहण किया है ॥ अन० । हे सखी जो बातें मुनि के पीछे डुई थीं” सो उन से क्स ने कह दों ॥ ९2 44 847 0]४१'५॥,&, [4०7 ए. प्रिग । जब मुनि यज्ञस्थान के निकट पहुंचे तब आकाशवाणी कह गई“ ॥ आ्न० । (बक्ति होक) तू केसी ” अचम्भे की बात कहती है ॥ प्रिग्। सखी सुन | आकाशवाणी ने यह कहा कि हे ब्राह्मण जेसे होम की अग्नि से शमी गर्भवती होती हे“ तेसे ही तेरी बेटी ने पृथी की रछ्ला के निमिन्न राजा दुष्न्त से शक अंश तेज का” लिया है ॥ उप्न० । (आनन्द से प्रियंवदा को भेटढकर) हे सखी यह सुनकर मुझे बड़ा सुख हुआ | परंतु सखी के बिछोह का दुख भी है। इस लिये आज हमारा हषे शोक समान हे ॥ प्रिग्। सखी को सुख होगा। इस से हम को भी कुछ शोक न करना चाहिये ॥ जआन०। में ने इसी दिन के लिये उस नारियल में जो वह” देखो आम के वृक्ष पर लटकता है नागकेशरी भर रक्‍खी थी। तुम उसे उतारकर कमल के पच्ने में रक्खो । तब तक में थोड़ा सा गोरोचन ”* आर मिट्टी ओर टूब मद्भलकाये के लिये त्ने झआऊं ॥ प्रि०्। बहुत अच्छा ॥ (प्रियंबदा ने नागकेशरी छी और अनम॒या गई) (नेषष्य में) हे गोतमी शाजह्लुरव झोर शारद्तत मिश्रों से कह दो कि शकुन्तत्ना के संग जाना होगा ॥ प्रि० । (कान छूगाकएं अनसूया विलग्ब मत करो। पिता कन्व हस्तिनापुर “ के जानेवाल्नों * को आज्ञा दे रहे हैं ॥ (स्नसया सामग्री लिये आई) ज्पन० । में आाई। चत्नो ॥ (दोनों गई) प्रि०। (देखकर) वह देखो । शकुन्तत्ना सूयोट्य का सिरस्नान करके खड़ी है ओर बहत सी ऋषियों की स्त्री टोकरियों में तरइत्न त्विये आशीस दे रही हैं । चल्लो । हम भी आशीस दे आवें ॥ 48०7 7ए.] 84 07४१७॥,3. 46 (शकुन्तला और गौतमी और तपसश्ियों की स्त्रियां आई) १ तपस्विनी । हे राजवधू तू पति की प्यारी हो ॥ २ तपस्विनी । तू सूरवीर पुत्र की माता हो ॥ (च्ञाशीवाद देकर तपस्विनी गईं) दो" सखी । (शकुलला के निकट जाकर) कहो सखी स्नान अच्छे हुए ॥ शकु०। (आदर से) सखियो भत्नी आई । यहां बेठो। कुछ बातें करें ॥ (दोनों बेढ गई") अन० । तुम नेक ठहरो | तो में कुछ मह्जत्न नेग कर दूं॥ शकु० । तुम करोगी सो अच्छा ही करोगी। परंतु फिर तुम से मिलने का झवसर कठिन हो जायगा ॥ (यह कहकर आंसू डाल दिये) दो” सखी । सखी ऐसे मड्गल समय जब कि तू सुख भोगने जाती हे रोना उचित नहीं ह्टै ॥ (यह कहकर दोनों ने आंसू डाल दिये और वस्त्र पह- राने लगी) प्रिग्। सखी तेरे इस सुन्दर अज्ल को तो अच्छे वस्त्राभरण चाहिये थे । परंतु अब ये ही साधारण पूल पत्ते आश्रम में मिल्न सके हम पहराती हैं ॥ (कन्व का चेला अच्छे अच्छे वस्त्राभूषण छेकर आया) चेत्ला । रानी को ये वस्वराभूषण पहराझो ॥ (देखकर सब स्त्री चकित हो गई”) गोतमी । हे पुत्र हारीत ये वस्वाभूषण कहां से आए ॥ चेत्ना । पिता कन्व के तपप्रभाव से ॥ गो? । क्या यह मन में बिचारते ही प्राप्त हो गये ॥ चेतना । नहीं। महात्मा काश्यप की आज्ञा हुई कि शकुत्तत्ना के निमित्न वुश्षों से फूल ले आओ । आयसु ” होते ही तुरंत किसी वनदेवी ने कोमत्न हाथ उठाकर चन्द्रमा के तुल्य श्ेत साड़ी दी । किसी ने महावर के लिये लाक्षारस दिया । कोई” भूषण बनाने त्नगी ॥ 46 607 07४१'५.8. [4०% ॥५, प्रिग्। कमल्न के मकरन्द को महक की मक्खी भी सिर भुकाती है ॥ गो? । (शकुलला को देखकर) वनदेवियों से वस्वाभरण मित्लना यह सगुम तुके सासरे में राजलघ्सी का दाता होगा ॥ (शकुल्तला छज्ा गई) चेत्ला । गुरु जी माल्निनी के स्रानों को गये हैं । वहीं जाकर यह वुत्तान्त वनदेवियों के सत्कार का उन से कहूंगा ॥ (गया) अन० । (आमूषण पहराती हई) हे सखी हम वनवासिनियों ने ऐसे भूषण आगे कभी न देख थ। इस से हम ज्यों के त्यों पहराना नहीं जानती हैं। परंतु में अपनी चित्रविद्या के बल से" सिंगार कराती हूं ॥ शकु०। (ुसक्ाकए हां तेरी चतुराई को में जानती हूं॥ (कन्व कुछ विचार करते हुए आर) कन्व । (जप ही आए) ह्याज शकुन्तत्ना जायगी। इस से उत्कण्ठा करके मेरा हृदय लेह के बस आंसुओं से भरा आता हे” । जब मुकू वन- वासी की यह दशा है तो गृहस्थियों की क्या गति बेटी बिदा होने के समय होती होगी “ ॥ (इधर उधर मन बहलाने के लिये दहलने लगे) े प्रिग । सखी शकुन्तत्ना अब तुम्हारा यथोचित सिंगार इआ। इस साड़ी को जो वनदेवियों ने दी हे पहरो ॥ (शक्रुलला ने उठकर साड़ी पहरो) गौ? । हे पुत्री पिता कन्‍्व मिलने को आए हैं ॥ शकु० । (उठकर छज्ञा से) पिता में नमस्कार करती हूं ॥ कन्व । पुत्री जेसी णयारी राजा ययाति” को शर्मिष्ठा हुई तेसी तू अपने पति को होगी । ओर जेसा चक्रवर्ती पुत्र पुरु शमिष्ठा के“ हुझ्ला तेसा ही तेरे होगा ॥ गो० । क्रषि के वचन सत्य होंगे” ॥ कन्व | झाओ बेटी। हतासन की प्रदष्चिणा कर त्नो। (रब ने प्रदक्षिणा कौ) यही अग्नि जो वेदी में प्रज्वत्नित होकर नेवेग्व को लेती है परंतु मन्त्र पढ़ी दाभ को यद्यपि आस पास“ बिछो है परंतु” बाधा नहीं पहुंचाती यही अग्नि जो हृष्य के गन्ध से पापों को नाश करती 4०% 7ए.] बंध पी ७६, 47 है तेरी रक्षा करेगी” । (शकुूला ने परिक्रमा दो) अब पुत्री तू शुभ घड़ी में बिटदा हो । (चारों चोर देखकर)! संगजानेवात्ने मिश्र “” कहां हैं ॥ (शाड्लुरव और शारद्तत आर) दो" भाई । मुनि जी हम ये हैं ॥ कन्व । पुत्र शाज्लरव अपनी बहन को गेतल्न बताओ ॥ सारथी। झाओ भगवती । इधर ञझाझो ॥ (सब चले) कन्‍्व । हे तपोवन के वृक्षो जिस शकुन्तत्ना ने तुम्हारे विना सीचे कभी जलन भी नहीं पिया और जिसे यद्मपि पुष्पपत्र के गहने बनाने का चाव था परंतु यार के मारे तुम्हारे फूल पन्ने कभी न तोड़े और बड़ा आनन्द सदा तुम्हारे मोरने के समय माना इस को तुम पति के घर जाने की आज्ञा दो । (कोयल ” बोली) यह देखो वनदेवियों ने आज्ञा दी ॥ (आकाशवाणी) शकुत्तत्ता को यह यात्रा मद्भलकारी हो। और उस के सुख के निमिन्न मागे में पवन फूतल्नों का पराग बरसावे । कमल्मसंयुक्त निमेत्ल जल्न के ताल उस को पयेटन में सुख द। ओर वृघ्यों की सघन छाया सूये के तेज से रछ्या करे ॥ सारथी | यह आशीवाद किप्त ने दिया कोकित्ला ने या तपस्वियों की सहवासधिनी वनदेवियों ने ॥ ' गो? । हे पुत्री तपस्वियों की हितकारी वनदेवी तुके आशीवाद देती *२५ हूं।त्‌ भी इन को प्रणाम कर ॥ (शकुन्तछा फिरकर नमस्कार किया) शकु०। (प्रयंवदा से हौले होले) हे प्रियंबटा आयेपुत्र से फिर भेट होने का तो मुझे बड़ा उत्साह है। परंतु इस वन को जिस में इतनी बड़ी हुई हू छोड़ते आगे को पांव नहीं पड़ते हैं ' ॥ प्रि०्;। अकेल्नी _ तुकी को शोक नहीं है। ज्यों ज्यों ” तेरे बिदा होने का समय निकट आता हे तेरे विरह से वन में बिथा सी * छायी जाती है। देख हरिणियों ने घास चरना छोड़ दिया है। मोर नाचना “ भूल 48 8 +(४१५॥,8. [4०० ए, गये हैं । वश्चों के पन्ने तेरे बिछोह की आंच से पीले हो होकर / ऐसे गिरते हैं मानों आंसू टपके ॥ शकु० । पिता झआाज्ञा दो तो इस माथ्वीलता से भेट लूं। क्योंकि इस से मेरा बहिन का सा ल्रेह हे “ ॥ कन्व । बेटी मिलन ले । में भी तुम्हारे लेह को जानता हूं ॥ शकु० । (छता से भेढकर) हे वनज्योत्सा यद्यपि तू आम का आश्चय ल्ने रही है तो भी भुजा पसारके मुझ से मित्म ले | अब में तुरू से टूर जा पडूंगी '। परंतु मन तुभी में रहेगा ! पिता इस लता को मेरे ही समान गिनियो ॥ कन्व । बेटी मेरे मन में बड़ी चिन्ता रहती थी कि तुके अच्छा पति मित्ने । सो अपने स॒कृतों से तें ने योग्य वर पाया । अब में तेरी पारी लता का भी विवाह इस आम से जो उस के निकट मोर रहा है कर टूंगा । तू विल्लग्ब मत करे | बिदा हो ॥ शकु० | (दोनां सश्ियां के पास ज्ञाकर) ह्टे सखियो प्यारी माध्वी को है| तुम्हें सांपती हूं ॥ दो?” सखी | सखी हमें किस को सोॉंपे ' जाती है ॥ (दोनों ने आंमू डाल दिये) कन्व । अनसूया इस समय रोना न चाहिये। शकुन्तत्ना को धीरज बंधाजओो ॥ (सब झागे को चले) शकु० । हे पिता जब यह हरिणी जो गभे के बोर से चलने में अत्ल- साती है ओर आश्रम के निकट चरती है जने तब इस की कुशत्न कहत्ना भेजना “ । भूत्तन मत जाना॥ कन्व। न भूलगा ॥ शकु० । (कुछ चछकर और फिरक) यह कोन है जो मेरे अज्बत्न को नहीं छोड़ता है ॥ (फिर पीछे फिरकर देखा) कन्व । यह वही मृगछोना है जिस को तें ने पुत्र सम” पाल्ना है। यह वही है जिस का मुंह जब कभी दाभ से चिर जाता था तू* 4८% ॥९.] 8607 7४१५॥,3. 49 हिंगोट का तेल लगाती थी झोर जिस को तें ने समा के चांवत्न खित्ना खित्लाकर इतना बड़ा किया हे। अब यह अपनी पालनेवाली के चरण क्योंकर छोड़े ॥ शकु० । अरे छोना तू मेरे लिये क्यों रोता है । तेरी मा तो तुफे जनते ही * छोड़ मरी थी । में ने पालकर तुझे इतना बड़ा किया हे। तेसे ही मेरे पीछे “ पिता कन्‍्व तेरा पालन करेंगे। अब तू त्नीट जा ॥ (आंसू डाछती चल) कन्व । बेटी यह समय रोने का नहीं हे। हम सब फिर मिलेंगे। जांसुओं से तेरी टृष्टि रू रही है। इस से ऐसा न हो कि ऊंचे नीचे में पांव पड़े । अब तू अपने धीरज से आंसुओं को रोक ॥ पारथी । हे महात्मा सुनते हें” कि यारे मनुष्यों को पहुंचाने वहीं तक जाना चाहिये जहां तक जल्लनाशय न मित्म | अब यह सरोवर का तट ञ्ञा गया । आप हम को आज्ञा देकर आश्रम को सिधारो ॥ क्‍ कन्व । तो आझाओ छिन मात्र इस वट को छाया में ठहर लें । (सब छाया में गये) राजा दुष्यन्‍्त को क्या संदेसा भेजना योग्य है ॥ (विचार करने लगा) । जपन० । (शकुनला से होले हौले) हे सखी जझञ्ञाज इस अआश्चम में सब का चित्च तुकी में लगा हे ओर सब तेरे बिछोह में उदास हैं । देख चकवी कमल के पन्नों में बेठी बड़तेरा बोलती है परंतु चकवा उत्तर नहीं देता । चोंच से चुगा” छोड़ तेरी ही ओर निहार रहा है ॥ कन्व । पुत्र शाज्लरव जब तू राजा के संमुख पडंचे तब शकुन्तत्ना को झ्ागे करके मेरी ओर से यह कहियो” कि हम तपस्वियों को केवत्न तप के धनी” जानो झोर अपने श्रेष्ठ कुल को बिचारकर इस लड़की पर भी सब रानियों की भांति वहीं लेह रकक्‍्खो जो तुम्हारे दटूय में झ्ाप से आप” इस की ओर उत्पन्न हुआ है। इस 9 ॥ 60 847 ए४१५.4. [4८% ॥9५, से अधिक हम क्या मांगें । और विशेष णयार तो भाग्य के आ- धीन है ॥ सारथी । आप का संदेसा मं ने भत्मी भांति गांठ बांध ल्निया ” ॥ कन्व । (शकुलला की ओर बड़े मोह से) हे पुत्री अब तुझे भी कुछ सीख टूंगा। क्योंकि यद्यपि हम वनवासी हैं तो भी लोक के व्यवहारों को भत्नी भांति जानते हैं ॥ सारथी । विद्वान पुरुषों से क्या छुपा हे ॥ कन्‍्व । बेटी सुन | जब तू रनवास में वास पावे तब पति का आदर आर गुरू जनों” की शपश्रृषा करियो | सोतों में सपल्लीभाव से मत रहियो। सहेत्नी की भांति टहत्न करियो । कदाचित पति तिरस्कार भी करे तो भी उस की आज्ञा से बाहर मत हजियो। नोकर चाकरों को एक सा समझ्ियो । ओर अपस्वार्थी मत हजियो । जो कुत्नवधू इस धमे में चल्नती हैं वे अच्छी गृहस्थिनी कहत्नाती हैं। ओर जो इस से विमुख होती हैं सो कुल्नकलनड्किनी होती हैं । जब पति संमुख आवे तो उठकर आदर कीजियो । ओर जो कुछ वचन वह कहे सो नम्रता से सुन ल्नीजियो । उस के चरणों में टृष्टि रखियो ओर बेठने को आसन दीजियो । पति की सेवा आप कीजियो | उस से पीछे सोइयो ओर पहलत्ने जागियो । यह सब कुत्नवधुओं के मुख्य धमे बड़ों ने कहे हैं । कहो गौतमी यह शिक्षा केसी है ॥ गो? । कुल्वधुओं के ल्निये यह उपदेश बढ़त अ्रेष्ठ हे । पुत्री इस को भूत्त मत जाना ॥ कन्व। बेटों आ। मुझ से ओर अपनी सखियों से एक बेर फिर मिल ल्ने ॥ शकु०। क्या प्रियंबदा ओर अनमया यहीं से झाश्चम को त्नौट जांयगीं ॥ कन्व। बेटी इन को लोट जाने की आज्ञा दे क्योंकि अभि जब तक कुआ- री हैं” इन का नगर में जाना योग्य नहीं है। गौतमी तेरे संग जायगी॥ 4८% ॥9५.] 85 एए7१.४,8. 5] शकु० | (कन्व से भेठकर) हाय में पिता की गोट से न्‍्यारी होकर मत्नय- गिरि से उखाड़े चन्दन “ के पोधे की भांति विहनी भूमि में केसे जी ऊंगी ॥ कन्व । पुत्री ऐसी विकत्न मत हो। जब तू घर की धनी होगी ओर राजापति मित्मेगा तब वेभव के कामों में यद्यपि कभी कभी व्याकुल हो जायगी परंतु इस दुख का कुछ बड़त ” स्मरण न रहेगा । ओर फिर जब तेरे तेजस्वी पत्र का जन्म होगा तब इस बिछोह को संपूर्ण भूत्न जायगी । (शकुलका ऋषि के पैरों में गिर पड़ी) मेरे आाशीवेाट से तेरी मनो- कामना पूरी होगी ॥ शकु०। (दोनों सल्ियों के पास जाकर ज्याझ्ो सखियो। दोनों एक ही संग भुजा पसा रके भेट त्नो ॥ अन०। दोनों मिलीं) हे सखी कदाचित राजा तुरंत तुझू को न पहचान तने “ तो यह मुदरी जिस पर उस का नाम खुदा है दिखा दीजियो ॥ शकु० । (बबराकर) सखी तेरे इस वचन ने तो मेरा ढृट्य कंपा दिया ॥ प्रि०। षारी डरे मत। ल्लेह में कूठी शट्गा] बहुधा उठती हैं ॥ सारथी | अब टिन बहुत चढ़ गया है “। चत्नो बिदा हो ॥ शकु० । (फिर आश्रम को ओर देखकर हे पिता इस आश्मम को कब फिर देखंगी ॥ कन्व । बेटी जब कुछ कात्न पति के साथ तुके “ बीत लेगा ओर तेरे महाबत्नी पुत्र हो लेगा ” तब उस पुत्र को राज्य सोंपकर अपने पति सहित इस आश्रम में तू फिर आवेगी “ ॥ गो? । चलने का समय बीता जाता है। अब पिता को ल्नोट जाने दे। मुनि जी आप जाओ ॥ कन्व । हे बेटी मेरे नित्यकमे में विश्न मत डाल्ने । (खास छेकर) मेरा शोक न घटेगा क्योंकि तेरे सुकुमार हाथों के बोये धान कुटी के सामने नित्य दृष्टि के सोंहीं रहेंगे। खब सिधारो | मागे मह्लत्वकारी हो ॥ (गौड़ और दोनों मित्रों . सहित शकन्तला गई) प्त4 62 8 07४'७,8. [4८7 ए दो? सखी । , (वियोग से शकुत्तला को ओर देखकर) हब तो सखी वक्षों की आझोट हुई “ ॥ कन्व । (खास लेक? बेटियों अब तुम्हारी सखी गई। तुम इस सोच को त्यागकर हमारे साथ आआओो ॥ दो" सखी। पिता शकुन्तत्ना विना तपोवन सूना त्वगता है ॥ (सब लौटे) कन्व। सत्य है तुम को ऐसा ही दिखाई देता होगा । (विचार करते हुए चले) शकुत्तत्तवा को बिदा करके आज में सुचित हुआ । बेटी कसी दिन पराए ही घर का धन होती है । ञ्लाज मेरा चित्न ऐसा प्रसन्न हुआ है मानो किसी की धरोहर दे दी "॥ झ्छः ५ स्थान राजभवन ॥ (एक बूढ़ा द्वारपाल खास भरता हुआ खाया) द्वार॒पात्न । हाय बुढ़ापे ने मेरी क्या दशा कर दी है। यही छड़ी जिस से में आगे रनवास में द्वारपालत्ली का काम भुगताता था अब बुढ़ापे में मरे चत्नने का सहारा बनी हे । (बाहर से शब्द हुआ कि राजा से कहो कुछ अवश्य कम हैं) मुझे कुछ समाचार राजा से भुगताने हैं । सो जब रनवास को जांयगे तब कहूंगा। परंतु इस में वित्श्व न होना चाहिये । (होले आगे को चल?) में क्या कहने को था । हां यह कि कन्व के चले आशीवाद देने आए हैं। हे देव बुढ़ापा भी मनुष्य को केसी ' झआपटा है। इस अवस्था में मनुष्य की बुद्धि बुकते दीपक के समान कभी ' मन्द कभी चेतन हो जाती है। इधर उधर फिरकर देखकर) महाराज वे बेठे हैं । कभी अपनी प्रजा को संतान के सटूश समाधान करके शकान्त में गये हैं जेसे गजराज दिन में सब हाथियों को इधर उधर भेजकर ञ्राप शीतल छांह में विश्राम लेने जाता है। राजा अभी धमासन से उठे हैं । इस त्रिये | 4&०क ए.] 84 एए४१५.४. 53 मुझे उचित नहीं हे कि इस समय कन्व के चेल्नों के आने का संदेसा कह । नहीं तो राजा विश्वाम को जाने से रुक जांयँंगे। परंतु जिन के सिर पृथी का भार है उन्हें विश्वाम कहां होता है। सूये के रथ में घोड़े संदेव' जुते ही रहते हं। पवन दिन रात चत्ना ही करता है। शेष- नाग ' सदा पृथी को सिर पर धरे ही रहता है। ऐसे ही जिस ने प्रजा की कमाई से छठा भाग त्विया उस को किसी समय विदश्वाम नहीं हे ॥ (इधर उधर डोलने लगा) (दृष्पनन और माठव्य कलसेवकां समेत आर) टुष्यन्त। (अकुछाता सा) याचक तो अपना अपना वांछित पाकर प्रसन्नता से चत्मे जाते हं । परंतु जो राजा अपने अन्तःकरण से प्रजा का निधार करता है नित्य चिन्ता ही में रहता है। पहले तो राज्य बढ़ाने की कामना चित्न को खेटित करती है । फिर जो देश जीतकर बस किये उन की प्रजा के प्रतिपाललनन का नियम दिन रात मन को विकत्न रखता है जेसे बड़ा छच्र यद्यपि घाम से रक्षा करता है परंतु बोर भी देता है ॥ (दो ढाड़ी / गाते हुए आए) प० ढाड़ी । कड्खा । निज्रकारणटुख ना सहो सहो पराश कान । राजकुलन व्यवहार यह सो पालह महाराज ॥ अपने सिर पर लेत हैं वषा शीत रू घाम । ज्ञिमि तरवर हित परथिक के निज्म तर दे विश्राम ॥ टू० ढाड़ी । ऋूप्पय । दृष्ट जननन वशकरन लेत जब दण्ड प्रचण्ठ हि। देत दस्ड उन नरन चलत मयाद जो हंड हि ॥ करत प्रज्ञाप्रतिपाल कलूह के मूल विनाश हि। ज्ञिहि निभिन्न नृपत्तन्म धममें सब करत प्रकाश हि ॥ महाराज टुष्पलत जू चिरज्ोवों नितनवल्वय । मेद्दि विप्न उत्पात रूब प्रज॒ हि करि राखो अभय ४ 85 ए९१५.5, [567 ए. दोहा । धनवेभव तो और ह्‌ बहुत छत्रियन माहि । पै सुप्रभाहित तुम हि से अधिक भेद कछु नाहि ॥ सोरठा। राखत बन्धु समान या ही ते तुम सबन को । करत मान संमान दुख न काहू देत़ तो ॥ दुष्प० । इस राग के सुनने से परिश्रमों का दुख मिटकर चित्न नया सा हो गया हे ॥ माढ्व्य। सत्य है। जेसे थके बेल की सब थकावट उस समय उतर जाती हे जब त्नोग कहते हैं कि ये आए देल्नों के राजा ॥ टुष्य० । (मुसक्याकर) उप्रहा मिच तू यहीं हरे । ञआा णएकान्‍्त बेंठें॥ (राजा और माठव्य दोनों बैठ) माढ० । (कान छूगाक0 मिच संगीतशाला की ओर कान लगाओ । देखो वीन की तान कैसी मधुर मधुर आती है। रानी हंसमती तुम्हारे सुनाने को किसी नये गीत पर अभ्यास कर रही है ॥ दुष्प० । चुप रह। सुनने दे ॥ द्वार॒पात्म । (आप हो आप अभी राजा का ध्यान ट्सरी ओर है। कुछ ठहरकर कहंगा ॥ (अलग चक्तठा गया) (नेपथ्य में राग कालंगड़ा इकताला) भरमर तुम मध के चाखनहार। आम को रसभरी मृदूलू मन्नरी ता सों प्रीति अपार ॥ रहसि रहसि नित रस लेवे को धावत है करि नेम । क्यों कल आई कमल बसेरे कित भूले प्यांरी को प्रम ॥ टु० । आहा यह गति केसा प्रेम उपजाती है ॥ माढ० । आप ने अथे समभक लिया । मेरी समर में तो नहीं ज्याया॥ टुष्य" । शुसुखाक) एक समय में हंसमती पर झ्ासक्त था। झोर अब 4८५ ए.] 54 0४१ ५,8, 5. चर इतने दिन” बिछुरे हो गये हैं । इस से उतल्नहना देती है। मित्र तू जा हमारी ओर से कह दे कि रानी हम तेरी चेतावनी को समझे ॥ माढ० | जो आज्ञा महाराज की। (होले मे उबक0 परंतु तुम तो मित्र शएेती ” कहते हो जेसे कोई तीक्षण बरछो की भातल को पराए हाथ से पकड़ना चाहे। मुझे यह अच्छा नहीं लगता है कि रोसभरी स्त्री से ऐसा संदेसा जाकर कह ॥ दुष्घ० । जा सखा । तेरी चतुराई की बातें उस का रोस मिटा देंगी ॥ माढ” । धन्य है| अच्छा संदेसा दिया “ | देखिये क्या हो ॥ (बाहर गया) तुष्य० । (आप ही आप यह क्या कारण है कि यद्यपि मुझे किसी लेही का वियोग नहीं है तो भी विरह का गीत ही सुनते “ मेरे चित्न को उदासी हो आती है । यह कारण हो तो हो” कि सुन्दर रूप देखकर ओर मधुर गान सुनकर मनुष्य को जन्मान्तर की प्रीति का स्मरण होता है ॥ द्वधार० । (उदास होकर और आगे बढ़कर) सहाराज की जय हो | हिमालय की तराई के वनवासी दो तपस्वी कुछ स्त्रियों समेत आए हैं और कन्‍्व मुनि का संदेसा लाए हैं। महाराज की क्या आज्ञा हे ॥ टुष्प" । (आशय से) क्या तपस्वी स्त्रियों के साथ आए हैं ॥ द्वार? । हां महाराज ॥ टुष्प० । सोमराट से कह दो कि वनवासियों को वेट्‌ की विधि से सत्कार करके लिवा लावे। में भी उन से भटने योग्य स्थान में बेठता हूं ॥ द्वार० । जो जझ्ाज्षा ॥ (बाहर गया) दुष्य० | कञ्चुकी हम को अग्निस्थान की गेल बताओ ॥ कब्चुकी । महाराज यह गैल्न है। (आगे गे चछ0 यह द्ार जिस में टाभ बिछे हैं और होमधेनु बंधी है अग्निहोतृ॒स्थान का है। आप पधारिये ॥ 56 847 0४१'७॥,4, [4८% ए. (नौकरों के कंधें पर सहारा लेकर / दुष्यन्त यज्ञस्थान को देहकी पर गया) दुष्प०। कन्व मुनि ने क्या संदेसा भेजा होगा । कहीं तपस्वियों के तप में किसी ने विन्न तो नहीं” डात्ना । अथवा तपोवन के जीवों को किसी ने सताया तो न हो । अथवा मेरे पापों से तपस्वियों की बोई लतावेत्नों का फूजना तो नहीं मिट गया। ये सब असमञज्ञस मेरे चित्त को व्याकुज्न करते हैं ॥ कज्चुकी । जिस बात की चिन्ता महाराज को है सो कभी न हुई होगी” क्योकि तपोवन के विन्न तो केवल्न आप के धनुष की टंकार ही से मिट जाते हैं। मेरे जाने ” ये तपस्वी महाराज के सुकर्मों' से प्रसन्न होकर धन्यवाद देने आए हैं ॥ (शारह्त और शाज्रुरव और गौतमी शकुत्तल्ा का हाथ गहे हुए झ्राश। और उन के आगे आगे बूढ़ा डारपाल और पुरोहित भी आर) द्वारपात्न । इधर जाओ महात्माझो । इस मागे आाझो ॥ शाहुरव | हे मिच शारद्तत देखो । जिस राजा के आधीन संसार के सवेमुख हैं " ञ्रोर जो सब मनुष्यों का आदर संमान करता है सो वह” विराजमान है । यहां कोई केसा ही झावे निरादर किसी का नहीं होता है“ । परंतु मेरा चित्न सदा सांसारिक बातों से विरक्त रहा है। इस लिये आज बह्त से मनुष्यों में आने से मन घबराता हे ॥ शारद्वत | सत्य हे । जब से नगर में धसे हं तब से मेरी भी यही दशा है। परंतु में ने तो अपना मन ऐसे समभ्या लिया है जैसे कोई निमेत्न जल से नहाया कसी तेल मिट्टी लपेटे हुए के साथ परबस पड़ जाय* अथवा शुद्ध मनुष्य को अशद्ध के साथ ओर जागते हुए को सोते के साथ ओर स्वतन्त्न को बंधुए के साथ रहना हो ओर वह अपने मन को धीरज दे ॥ पुरोहित । इसी से तो आप सरीके सज्जनों की बड़ाई है ॥ शकुन्तत्ना। (ुण स्गुन देखकए हे माता मेरी दाहिनी आंख क्यों फरकती है ॥ 6ैंश ९.] 8 0ट7९१'५.8. 67 गौतमी | देव कुशत्न करेगा । तेरे भतेा के कुलदेव अमड्जत्नां को टूर करके तुझे सुख देंगे॥ (सब झागे को बढ़े) पुरोहित। (राजा को बतछाकर) हे तपस्वियो वर्णाश्षम की“ रण्षा करने वात्ने महाराज आसन पर बेटे तुम्हारी बाट हेरते हैं ॥ शाज्ररव | यही हमारी चाह थी। क्येंकि सदा की रीति है कि फल आए वुक्त नवता है सुखट्‌ जतल्न धारण करके मेघ भृकता है। ऐसे ही परोपकारी नर संपत्चि पाकर अभिमान त्यागते हैं ॥ कज्चुकी । महाराज ये ऋषि त्नोग आप के संमुख चत्ने आते हैं। इस से आप में इन का लेह टिखाई देता है / ॥ तुष्प० । (शकुलका की ओर देखकर) जआ्याहा यह नारी कोन है जिस का रूप वस्त्रों मं ऋत्नक रहा है । तपस्थियों के बीच में ऐसी दीणयमान हे मानों पील्ने पन्नों में नई कोंपत्न ॥ कज्चुकी । महाराज यह तो प्रत्यक्ष ही है कि रूप इस भाग्यवती का ट्शेन योग्य है ॥ तुष्य० । रहने दो । पराई स्त्री देखनी उचित नहीं हे ॥ शकु० । (ख्राप ही आप अपने दृदय पर हाथ रखकर) हे ह्ट्य त्तूः क्यों घड़कता हे | राजा के प्रथम मित्माप का ध्यान करके धीरज धर ॥ परोहित। (आगे जाक) महाराज का कल्याण हो | इन तपस्थियों का आदर सत्कार विधिपृवेक” हो चुका । अब ये अपने गुरू का संदेसा त्वाए हैं। सो सुन त्नीजिये ॥ दुष्य० । (आदर से) सुनता हूं। कहने दो ॥ दो? भाई । (हाथ उ्गकर महाराज की जय रहे ॥ दुष्प० । तुम सब को में भी प्रणाम करता हूं ॥ दो" भाई। जाप के कल्याण हों ॥ दुष्घ२ । तुम्हारे तप में तो कुछ विप्न नहीं पड़ा ॥ 88 50 :९॥) ॥ ७ | है ऐ [4८% ५. शाज्लरव। जब ञ्ञाप तपस्वियों के रखवात्ने बने हो फिर विघ्न क्योंकर पड़ेगा। सूये के प्रकाश में अंधेरा कब रह सकता है ॥ दुष्प० । (आप हो चाप) जो मेरा ऐेसा प्रताप है तो अब राजा शब्ट मुक्त में यथाथे हुआ ” । हगण कन्व मुनि प्रसन्न हैं ॥ शाज्लेरव । महाराज कुशल तो तपस्वियों के सदा आधीन रहती है। गुरु जी ने आप का अनामय पूछकर यह कहा है ॥ तदुष्य० । क्या आज्ञा की है ॥ शाज्लरव । कि आप का इस कन्या से विवाह हुआ” सो हम ने प्रसन्नता से अज्ञोकार किया क्योंकि आप तो सज्जनशिरोमणि हो आर हमारी शकुन्तत्ना भी साप्लात सुशीत्वता का रूप“ है। अब कोई ब्रह्मा” को यह दोष न देगा कि अनमिलन जोड़ी मित्नाता है। तुम्हारे दोनों के“ समान गुण हैं। ऐसे टूल्नह दुलनहिन की जोड़ी मिल्लाकर ब्रह्मा नामधराई से बचा । शकुन्तत्ना तुम से गर्भवती है। अब इस को अपने रनवास में लो ओर दोनों मित्कर शास्त्रानुसार व्यवहार करो ॥ गोतमी | हे राजा तुम बड़े मृदुल्नस्दभाव हो । इस से मेरे भी जी में कुछ” कहने को आती है ॥ टुष्य? । (मुसक्याकर) हां निस्संदेह कहो ॥ गोतमी । शकुन्तत्ना अपने पिता के आने तक न ठहरी ओर ञाप ने भी अपने कुदुखियों से कुछ” न पूछी । आप ही आप दोनों ने ब्याह कर लिया। लो अब निधड़क बात चीत करो। हम तो जाते हैं ॥ शकु० । (आप ही आप) टेखूं कब यह क्या कहे ॥ टुष्प० । (क्लेश में झ्ाकर आप हो चाप) यह क्या वत्नान्त हे ॥ शकु० । आप ही आप) हे दई राजा ने यह संदेसा ऐसे निराटर से क्यों सुना ॥ शाहहुरव। (जाप ही आए) राजा ने अभी होत्ने से कहा हे कि यह क्या वच्चान्त है। सो ऐेसा क्यों कहा | »गण राजा तुम त्नोकाचार की सब 4८०7 ५.] 840 ए7'७।,8. 59 बातों को जानते हो | स्त्री केसी ही सुशीलता से रहे” फिर भी पति के होते” पीहर रहने में त्वोग चवाव करते हैं । इस लिये अब हमारी इच्छा है कि चाहे इस पर तुम्हारा यार हो चाहे ” न हो यह तुम्हारे ही घर रहे तो भत्नी है ॥ दुघ० । तुम क्या कहते हो। क्या मेरा इस का कभी विवाह डुआ है ॥ शकु० | (उदास होकर आप हो आप) ञ्प्ररे मन जो तुझे डर था स्तो डे ज्पागे ज्ञाया॥ शाजहुरव | महाराज क्या अपने किये को पछताते हो ॥ दुष्य९ । तुम किस भरोसे पर इस निमूतल्न कहानी को सच्ची बनाया चाहते हो ॥ शाहुरव । (#रध से) जिन को ऐेश्वये का. सद्‌ होता है उत का चित्र स्थिर नहीं रहता ॥ दुष्य"। यह वचन तुम ने बडत कठोर कहा ॥ गोत० । (शकुलला से) हे पुत्री अब बढ़त तल्लाज मत कर ल्ना। में तेरा घूंघट खोत्न दूं जिस से तेरा भता तुकू पहचान त्ने ॥ (घूंघठ खोल दिया) टुष्य० । (शकुललला को देखकर आप ही आप) जब में यह बिचारता हूं कि इस सुन्दरी का पाणियहण कभी आगे में ने किया है या नहीं तो मेरी गति उस भोरे की सी हो जाती है जो प्रातकाल ओस की बूंदभरे कुन्द पर भ्रमता है न छोड़ सके न बेठ सके ॥ कच्चुकी । होले दुषघल से) महाराज तो अपने धमे ओर अधिकार में सावधान हैं । नहीं तो शेसे स्त्रीर्् को अपने रनवास में झआाने से कोन रोकता है ॥ शाहुँरव | महाराज चुप क्यों हो रहे हो ॥ दुध०" । हे तपस्वी में वार वार सुध करता हूं परंतु स्मरण नहीं होता कि इस स्त्री से कब मेरा विवाह हुआ | झोर यह बात शक्षत्रीधम से विरुद्ध है कि जिस को पराया गभे हो उसे में अपने रनवास में त्नूं ॥ ) 60 840 0४१७॥.,8, [4०५० ए, शकु० । आप ही आए) हे देव जो मेरे संग ब्याह ही होने में संदह है तो अब मेरी बडत टिन की त्मगी आसा टूटी“ ॥ शाज्जरव । महाराज ऐसे वचन मत कहो | जिस ऋषि ने तुम्हारे अपराध को भूत्त अपनी कन्या ऐेसे भेज दी है जेसे कोई चोर के पास अपना धन भेज दे उस का अपमान मत करो ॥ शारद्दत । शाज्जेरव तुम ठहरो । शकुन्तत्ला अब तू आप ही कुछ पता बतत्नाकर अपने पति को सुध दित्ना। यह तुझे भूत्ना जाता है ॥ शकु० । आप ही आप) जो वह” ल्ेह ही न रहा तो अब सुध दिल्नावे” क्या होता है। ओर जो इस जीव को दुख ही बदा है तो कुछ बस नहीं है । परंतु इस से दो बातें तो अवश्य करूंगीं। (गण हे आयेपुत्र (फेर रुक गए! ओर जो इस शब्द में कुछ संदेह है तो हे पुरुवंशी यह तुम को उचित नहीं है कि आगे तपोवन में ऐसी प्रीति बढ़ाई झोर अब ये निठुर वचन कहते हो ॥ टुष्प० । (कान पर हाथ धरकर) क्या त्‌ मुक्त निर्दोषी को कलहडूः लगाने कक लिये कुछ छत्न करती हे। देखो जो नदी मयाद छोड़कर चलन दी है“ वह अपना ही तट खसाकर गदती होती है ओर तट के वृक्षों को गिराकर अपनी शोभा बिगाड़ती है ॥ शकु० | जो तुम सुध भूलकर सत्य ही मुक्े परनारी समके हो तो ल्नो पते के लिये तुम्हारे ही हाथ की मुदरी देती हू जिस में तुम्हारा नाम खुदा है ॥ टुष्प० । अच्छी बात बनाई" ॥ शक॒०। (उंगली को देखकर) हाय हाय मुद्री कहां गईं ॥ (बड़ी व्याकुछता से गोतमी की झोर देखती हुई) गोतमी । जब तें ने शक्रावतार ” के निकट शचीतीथे में जल्लाचमन किया था तब मुदरी गिर गई होगी ॥ टुष्य० । भुसकाकर) चियाचरित्र यही कहत्नाता है ॥ 42८7 ५.] 8430 0.२'0],8. 6 शकु०। यह” विधि ने अपना बल्न दिखाया है। परंतु अभी एक पता आर भी दूंगी ॥ टुष्य० । सो भी कहो ॥ शकु० । उस दिन की सुध है या नहीं जब आप ने माध्वीकुञ्ज में कमल के पत्चे से जल्न अपने हाथ में त्निया ॥ टुष्प० । तब क्या डइुआ ॥ शकु०। उसी छिन एक मृगछोना जिस को में ने पुत्र की भांति पात्ना था आ गया । आप ने बड़े यार से कहा कि आ बच्चे पहत्ने तू ही पानी पी ल्ने। उस ने तुम्हें विदेसी जान तुम्हारे हाथ से जलन न॑ पिया। मेरे हाथ से पी ल्लिया । तब तुम ने हंसकर कहा कि सब कोई अपने ही संघाती को पत्याता है। तुम दोनों एक ही बन में वासी हो ओर एकसे मनोहर हो ॥ टुष्घ० । चतुर स्त्रियों के मधुर वचनों ही से तो कामी मनुष के मन डिगते हैं ॥ गोतमी । बस राजा । ऐसे कठोर वचन कहने योग्य नहीं हे। यह कन्या तपोवन में पत्नी है । यह टुखिया छत्न क्या जाने ॥ दुधध० । हे तपस्विनी विना सिखाए भी स्त्रीजाति” की चतुराई पुरुषों से अधिक होती है। सो यह “ बात केवलत्न मनुष्य ही में नहीं है सब जीव जतन्तु में हे। ओर कटदाचित ' स्त्री अच्छी सिखाई जांय तो न जानिये क्या करें" । देखो कोयत्न अपने अंडे बच्चे “ टूसरे पश्षियों से जिन से उस का कुछ संबन्ध नहीं है पत्नवाती है ॥ शकु० । (क्रोप करके) हे निल्मेंज्ज तू अपना सा कुटिल हृटय सब का जानता है “। तुकू सा पाखणडगी ओर कपटी राजा न कोई पृथी पे हुआ हे न जआागे होगा । तें ने धमे के भेष में कपट रेसे दुराया है मानो गहरे कृुए का मुख घास फूस से ढका हे ॥ टुष्य? । (आप ही आप) इस का कोप मेरे मन में संदेह उपजाता है कि 62 8 00 ए९१५,3, [4०7 ए, इस का कहना कहीं सचा ही न हो "। रोस से इस की आंखें त्नाल् हो गई हैं ओर जब कठोर वचन बोलती है तो मुख से शब्द टूटते हुए निकलते हैं । त्लाल होठ ऐेसे कांपते हें मानो तुषार का मारा” बिखाफल ओर भेंहें यद्यपि सीधी हैं परंतु रोस में टेढ़ी हो गई हैं। जब अपने साधारण रूप की छवि से यह मुझे न छल्न सकी तब रिस का मिस करके भृकुटी ऐसी चढ़ाई है मानो कामदेव के धनुष के दो टुकड़े किये हैं '। जो कदाचित यह दूसरे की स्त्री न होती तो क्या आश्चये हे कि इसी धनुष से मुक्के घायल करती । (प्र० हे बाल्ना दुष्यन्त के शीतल स्वभाव को सब जानते हैं। परंतु तेरा प्रयोजन क्या है। सो कह ॥ शकु० । (आाजलुत्ति को भांति ) हां सत्य हे तुम राजात्नोग ही तो सब बात के प्रमाण होते हो और तुम ही" यथाथे धमे और त्नोकरीति जानते हो । स्त्री दुखिया केसी ही लाजवती ओर सुलछ्णी हो” तो भी धमे नहीं जानती है न सच बोलना जानती है। अच्छी घड़ी में मनभावते को ढूंढने झाई ओर अच्छे मुहते में पुरुवंशी राजा से व्याह हुआ | तेरे मीठे बचनों ने मेरे विश्वास को जीत लिया या | परंतु हृदय में छिपा हुआ वह अस्त्र निकला जिस से मेरे कल्नेजे को घाव तल्लगा ॥ (घरृंघद करके रोने हूगी) शाज्भरव । इस राजा को चपलता देखकर मेरा मन लजाता हे। अब से ' जो कोई गुप्त संबन्ध करे उसे चाहिये कि पहलत्ने परीक्षा कर त्ने क्योंकि जो प्रीति विना स्वभाव पहचाने” जुड़ जाती है थोड़े ही काल में बेर हो जाता है ॥ टुष्घ० । क्या तुम इस की चिकनी चुपड़ी बातों को प्रतीति करके मुफे घोर पाप में डात्ना चाहते हो ॥ शाजह्लरव । (अवश करके ) उत्तर था सो सुन त्निया । यहां इस कन्या को कि जिस ने जन्म भर छत्म का नाम भी नहीं सीखा हैं कोन ह#८+7 ए९.] 54300 ४१७५।.,8४. 63 ० प्रतीत करता है। यहां तो वे ही सचे हं जो टूसरे को दोष लगाना पढ़े * हूं ॥ दुप० । तुम बड़े सत्यवादी हो। ठीक कहते हो | में ऐसा ही हूं। परंतु यह कहो इस स्त्री को दोष लगाने से मुझे क्या मित्मेगा ॥ शाज्लरव | भारी विर्षात ॥ दुष्य० । नहीं । पुरुवंशियों के भाग्य में विपन्चि कभी नहीं लिखी ॥ शारद्तत। हे शाड्लेरव इस वाद से क्या अथे निकत्नेगा । हम तो गुरु का संदेसा त्वाए थे सो भुगता चुके। अब चत्नों। ओर हे राजा यह शकुन्तत्ना तेरी विवाहिता स्त्री हे चाहे तू इसे रख चाहे छोड़ । स्त्री के ऊपर पति को सब अधिकार होता है। आओ गोतमी । चत्नो ॥ (दोनों मिश्र और गोतमी चले) शकु० । हाय यह तो छल्रिया निकलना | अब क्या तुम भी मुझे छोड़ जाओगे ॥ (उन के पीछे चल खड़ी हुई) गोतमी । (पौद्े फिकर) बेटा शाह्लैरव शकुन्तत्ना तो वित्नाप करती यह पीछे पीछे आती है । ठुखिया को निर्मोही पति ने छोड़ टिया । अब यह क्या करें ॥ शाज्भजरव । (क्रोष करके शजुलला *े) हे अभागी तू पति के ओगुण देखकर क्या स्वतन्त्न हुआ चाहती है ॥ (शक॒न्तला ठहर गई और कांपने लगी) शारद्तत। हे भाग्यमान सुन ले | जो तू ऐसी ही है जेसा तेरा पति कहता है तो पिता के घर रहने का तेरा क्या अधिकार रहा । और जो तू अपने मन से सची हे तो पति के घर में टासी होकर भी रहना अच्छा है। अब तू यहीं ठहर | हम आश्चम को जाते हैं ॥ दुष्य० । हे तपस्वियों क्यों इसे कूठी आशा देते हो । देखो चन्द्रमा कमो दिनी ही को प्रसन्न करता है ओर सूये कमत्न ही को खिल्नाता है। रेसे हो जितेन्द्रिय पुरुष पराई स्त्री से सदा बचे * रहते हैं ॥ 64 84370 ए४१'७,8. [4>» ए. शारद्यत | सत्य है। परंतु तू ऐसा पुरुष हे कि अधम ओर अकीति से डरता है तो भी अपनी विवाहिता को छोड़ते” नहीं ल्ज्ञाता। ऊअोर मिस यह बनाया है” कि प्रजोपकार ” के कामों में अपने वचन को भूत्न गया है ॥ दुष्पय० । (अपने पुरोहित से) न जानू” में ही भूल्न गया हूं या यही भूठ कहती है | हे पुरोहित तुम कहो दोनों पापों में से कोन सा बड़ा है अपनी विवाहिता स्त्री को त्यागना अथवा पराई” को ग्रहण करना ॥ पुरोहित । (बहु सोचकर महाराज इन दोनों के बीच में एक तीसरा उपाय झोर है । सो करना उचित है अणथेात यह कि जब तक इस के पुत्र का जन्म “ हो तब तक मेरे घर में निवास करने दो ॥ टुष्प० । यह क्यों ॥ पुरो" | अच्छे अच्छे ज्योतिषियों ने आगे ही कह रखा है कि आप के” चक्रवर्ती पुत्र होगा। सो कदाचित ” इस मुनिकन्या के” ऐसा ही पुत्र जन्मे ओर उस के लछ्षण चक्रवर्ती” के से पाए जांय तो आप इस को झादरपृवेक रनवास में त्नलेना । नहीं तो यह अपने पिता के आश्रम को जायगी ॥ दुध" । अच्छा । जो तुम्हारी इच्छा हो ॥ पुरो? । (शकुलला *े) ऋआ पुत्री । मेरे पीछे चत्नी आ ॥ शकु० | हे धरती तू मुके ठोर दे “। में समा जाऊं ॥ (रोती हुई पुरोहित के पीछे पीछे " गई | और तपस्वी और गौतनी दूसरो ओर गये | शक॒न्तक्ा को ४ ज्ञाती देखकर राजा खड़ा सोचने लुगा। परंतु शाप के बस फिर भी ““ सध न आई) (नेषष्य में) जहा बड़े आश्चये की बात हुई ॥ दुष्य० । (कान लगाकर) क्या छुआ ॥ (पुरोहित फिए आया) पुरो"। महाराज बड़ा अचम्भा हुआ । जब यहां से निकल्नकर कनन्‍्व 4८% श].] 62 07१'५.,8. े 65 के चेत्ने गये ओर शकुत्तत्ना अपने भाग्य की निन्‍दा करती हुई बांह उठाकर रोने लगी . . . . ॥ दुष्प० । तब क्या हुआ ॥ पुरो० । तब अप्सरातीथे के निकट स्त्री के रूप में कुछ बिजल्ीी सर आई। सो शकुन्तत्ना को उठा छाती से लगाकर ले गई ॥ 0 (सब झाश्रये करने लगे) " दुघ० । मुके पहत्ने ही “ भ्यास गई थी कि इस में कुछ छत है। सो ई हुआ “। अब इस बात में तके करना निष्फत्न है। तुम विश्वाम करो ॥ पुरो० । महाराज की जय रहे ॥ (बाहर गया) दुष्प० । हे द्वारपात्निनी इस समय मेरा चिनत्न बहुत व्याकुल हो रहा है।आ तू। मुझे शयनस्थान की गेत्न बता ॥ द्वारपात्निनी । महाराज इस मागे आइये ॥ दुष्प० । (बला हुआ आप ही आप) में बढ़तेरा सुध करता हू परंतु ध्यान में नहीं आता कि मुनिकन्या से कब मेरा विवाह हुआ। ओर हृट्य उकताकर ऐेसा हो गया है कि इस स्त्री के वचनों को प्रतोति करना चाहता हे ॥ जडूः & स्थान एक गली ४ (कोतवाल और दो पियादे शक मनुष्प को बांधे हुए लाश) पहंत्ना पियादा । (बंधुश को पीटा हुआ) अरे कुम्मिलक बतत्ना | यह ऋंगूटी जिस के हीरे' पर राजा का नाम खुदा है तेरे हाथ” कहां से आई॥ कुम्भित्वक । (कंप्त हआ) मुझे मारो मत। मेरा ऐसा अपराध नहीं हे जैसा तुम समझे हो ॥ छू 60 8647 0779१'७].5. [4०% शा, प० पियादा | क्या त कोई अ्रष्ट न्नाझ्षण है कि सपात्र जान राजा ने यह अंगूठी त॒के दक्षिणा में दी हो ॥ कुम्मि०। सुनो । में शक्रावतारतीथे का धीमर हूं ॥ टूसरा पियादा। कह। क्या तेरी जाति पांति पूछते हैं ॥ कोतवाल । हे सूचक इसे अपना सब वृन्नान्त कहने दो। कह रे। सब कह दे । जब तक यह कहे तब तक इसे बांधो | मारो मत ॥ दोनों पियादे। सुनता है रे या नहीं | जेसे कोतवाल जी आज्ञा देते हैं वेसे कर ॥ कुम्मि० । में तो जाल ' बंसी से मछत्नी पकड़के अपने कुटुख का पालन करता हूँ ॥ कोत० । (हंसक तेरी बहुत अच्छी आजीविका है ॥ कुम्मि०। महाराज मुझे क्या दोष है। यह तो हमारा कुलधमे ही है। परंतु हम ल्नोगों में भी बह़तेरे द्यावान होते हैं ॥ कोत० । अच्छा । कहे जा ॥ कुम्भि० । एक दिन एक रोहमछल्नी' में ने पकड़ी । उस के पेट में यह हीराजड़ी अंगूठी निकली | इसे बेचने के लिये में टिखत्ना रहा था । तब तक तुम ने आ थामा । इतना ही अपराध मेरा ' है। अब जैसा तुम्हारे धमे में त्लिखा हो तेसा करो। चाहो मारो चाहो ' छोड़ो ॥ को त० । (अंगूठी को मूंपर सत्य हे इस अंगूठी में मछत्नी की बास आती है। इस से निश्चय यह मछल्नी के पेट में रही होगी" । चलो । राजा के सामने चल्लें ॥ दो? पियादे। चल्नो जी ॥ (रूष चले) कोत० । सूचक तुम इस बड़े फाटक पर चोक में ठहरे रहो। में अंगूठी का वृत्नान्त सुनाकर राजा की आज्ञा ले आऊं ॥ दो? पियादे। झच्छा। जाओ ॥ (कोतवाल गया) पर० पियादा। हे जाह्लुक इस चोर के मारने को मेरे हाथ झुजाते हैं ॥ 4०7 ५7१.] 84 07४१'५].8. 67 कुम्मि०। मुझ निरपराधी को क्यों मारना चाहिये ॥ _ हू० पियादा । ेखक कोतवात्न जी तो वे आते हैं । राजा ने भत्वा तुरंत ही निबेड़ा कर दिया। अब कुम्मिल्क तू या तो छूट ही जायगा नहीं तो" कुन्नों गिद्धों का भक्षण बनेगा ॥ (कोतवाल फिर आया) कोत? | धीमर को . . .. ॥ कुम्भि० । (घबराकर) हाय । अब मं मरा ॥ कोत०। . .. . छोड़ दो । महाराज कहते हैं कि अंगूठी का वच्चान्त हम जानते हैं । धीमर का कुछ अपराध नहीं है। इसे तुरंत छोड़ दो ॥ टू० पियादा । जो जआाज्ञा । ञ्राज यह चोर यम के घर से बच हअपाया ॥ (छोड़ दिया) कुम्मि० । (हाथ जोड़कर आप ही ने मेरे प्राण बचाए हैं ॥ कोत" । अरे जा। तरे भाग्य खत्न गये _। राजा की आज्ञा है कि अंगूठी का पूरा मोत्न तुके मित्ने। सो यह त्ने ॥ (चैली धोमर को दो) कुम्भि० । (हाथ नोइकरे में इस समय अपने तन में फूला नहों समाता हू ॥ प० पियादा। पूल्ना क्यों समायगा। तू सूली से उतरकर हाथी पर चढ़ा हे ॥ टू पियादा । राजा के प्रसन्न होने का क्या कारण है। अंगठी तो कुछ ऐसी बड़ी वस्तु नहीं है ॥ कोत० । प्रसन्न होने का कुछ यह भी कारण है कि अंगूठी बड़े मोत्न की है । परंतु मुख्य हेतु मुझे यह जान पड़ा कि अंगूठी को देखकर राजा को अपने किसी णारे की सुध आ गई । क्योंकि यद्यपि राजा का स्वभाव गम्भीर है तो भी जिस समय अंगूठी देखी विकत्न होकर मछे आ गई॥ टू० पियादा | तो आप ने राजा को बड़ा प्रसन्न किया ॥ “53 मर 8&९ 77 ४१'५,8, [4८% शा, प० पियादा | हां। इस धीमर के प्रताप से ॥ (धीमर की ओर कट्ठी आखों से देखा) कुम्भि०। रिस मत हो | अंगूठी का आधा मोल मदिरा पीने को तुम्हें भी टूंगा ॥ दो" पियादे। तो तू हमारा मित्र हे। मदिरा हम को बहुत प्रिय है । चत्नो । हम तुम साथ ही साथ “ हाट को चत्में ॥ (बाहर गये) स्थान राजभवन को फ़लवाड़ी ॥ (मिश्रकेशी अप्सरा पवन में दिल्वाई दी) मिश्रकेशी । एक करतब तो वह था जो में ने अप्सराती्थ पर किया । अब चल्नकर देखूं राजाधि की क्या दशा है। शकुन्तत्ना मुके बहुत पारी है काहे से कि” वह मेरी सहेली की बेटी है। ओर में मेनका की आज्ञा से यह वुत्ान्त देखने आई हू । (चारों ओर देखकर) आहा। आज उत्सव के दिन राजकुत्न में क्या उदासी छा रही है। मुक्के यह तो सामथ्ये हे कि विना प्रगट हुए भी सब वृच्नान्त जान लूं। परंतु मेनका की आज्ञा माननी चाहिये | इस लिये वृक्षों की ओट में बेठकर देखूंगी कि क्‍या होता हे ॥ (उतरकर एक स्थान में बेठ गई) (कामदेव को दो चेरी आम की मजन्नरी को देखती हुई जाई) प० चेरी । इस जआ्ञाम की हरी डातल्न पर नई मजरी” क्ोंका लेती केसी शोभायमान हैं। मानो वसन्‍त की मूछे जगाने को संजीवनी जाई है। इस में से एक डातल्नी रति की भेट करूंगी ॥ टू चेरी | हे परभृतिका तू क्या आप ही आप कह रही है ॥ प० चेरी। हे मधुकरी आम की मज्ञरी को देख कोकित्ना उन्मन् होती ही हे। सो तू जानती है कि मरे नाम का भी कोकिला ही ज्थे हे ॥ टू? चेरी | (प्रसन्न होकर ओर निकद खाकर) क्या प्यारी वसनन्‍्त ऋतु ज्पा गई।॥ प० चेरी। हां तेरे मधुर गीत गाने के दिन झा गये ॥ 4०7 १].] ; 540 0।४१५॥,8, 69 टृ० चेरी । हे सखी कामदेव की भेट को में इस वृष्ठ से सोंधे के गहने “ उतःरूंगी। तू मुझे सहारा देकर उचका दे ॥ प० चेरी । जो में सहारा टूंगी तो भेट के फल्न में से भी आधा ल्ंगी॥ टू चेरी। जो तू यह न कहती तो क्या आधा फतल्न न मिलता । मुक्के तुझे” विधिना ने एक प्राण दो देह बनाया है ॥ (रही उचकाकर” बांट हाथ से डाछ पकड़ी और दाहिने हाथ से मन्नर तोड़ी) अप्रष्टा ये कतलिियां तो अभी खिल्नी भी नहीं हैं । यह देखो । एक मज़्री खित्न गई है। इस में केसी सृहावनी महक आती है *। ७ुट्टी भरकर कलियां होड़ ला) यह फूल्न कामदेव को बड़त पारा है| हे मज्ञरी युवतियों का ढृटय छेदने को तू पत्बशर का छठा कण बनी हरे ॥ (मज्नरी अ५ेण कर दी) (ड्वारपाल आया) द्वारपात्न । रस होकए हे बावलत्नी तू क्यों कच्ची कल्नियों को तोड़ती है। राजा ने तो आज्ञा दे दी है कि अब के बरस ' वसनन्‍्तोत्सव न हो ॥ टो? चेरी | इ्ती हुई) हब का / हमारा झपराध क्षमा करो। हम ने नहीं जाना था कि राजा ने ऐसी आज्ञा दी है ॥ द्वार० । तुम ने न जाना। रूख पेड़ों ' ओर पश पश्षियों ” ने भी तो ” राजा के साथ उदासी मानी है। देखो ये कत्नियां बड्त दिनों से निकली हैं परंत खिलती नहीं हें । और करवक * का फल्न यद्यपि लग आया है परंत अब तक कल्नी ही बना हे। शिशिर बीतने को हे तो भी कोकित्ना की बाणी कण ही में रुक रही हे। देखो मटन ने धनष पर चढ़ाने को ञ्राधा तीर निकालकर फिर रख लिया हे ॥ दो? चेरी । (छाप ही आए) इस में संदेह नहीं हे कि यह राजा ऐसा ही प्रतापी है ॥ प० चेरी । कुछ दिन से हम को गन्धवेत्नोक के अधिकारी मित्रवसु ने राजा के चरण देखने को भेजा है । तब से हम राजा के उपवनों पी 58400 7४१'५].5. [4८५० ५. मे अनेक क्रोड़ा करती फिरती थीं। इस लिये राजा की यह आज्ञा हम ने नहीं सुनी ॥ द्वार० । हुआ सो डइुआ । फिर ऐसा मत करना ॥ दो” चेरी | राजा की आज्ञा तो हम मानेहींगी “ । परंतु हे द्वारपात्न जो हम इस वृत्नान्त के सुनने योग्य हों तो कृपा करके बताओ कि राजा ने क्यों वसनन्‍्तोत्सव का होना बरजा है ॥ मिश्रकेशी । ज्ञाप ही आप) राजाओं को राग रड्ढ सदा प्रिय होता है । इस लिये कोई बड़ा ही कारण होगा जिस से दुष्यन्‍्त ने ऐसी आज्ञा दीहे॥ द्वार" । (आप डी आए यह तो प्रसिद्ध बात है। इस के कह देने में क्या दोष है । ० क्या शकुन्तत्ना के त्याग का समाचार “ तुम्हारे कानों तक नहीं पहुंचा हे ॥ | प० चेरी। हां । अंगूटी मितल्न जाने तक का“ वच्नान्त तो हम ने गन्धवेल्लोक के नायक से सुन लिया हे ॥ _द्वार०। तो अब मुके थोड़ा ही कहना पड़ेशा”। सो सुनो । जब अपनी अंगूठी को देखकर राजा को सुध आई तो तुरंत कह उठा कि शकुन्तत्ना मेरी विवाहिता है । जिस समय में ने उसे त्यागा मेरी बुद्धि ठिकाने “ न थी । फिर राजा ने बह़त वित्नाप ओर पछतावा किया ओर तभी से संसार को सब छोड़ बेठा है“ न तो“ प्रजा के उपकार में चित्न लगता है न“ दिन प्रतिटिन ” राजसभा होती है । रात रात भर“ नींद नहीं आती | सेज पर करवंटें लेते” कटती हैं“। भोर जब उठता है तो सीधी कोई बात मुख से नहीं निकत्ल- ती। बिथा का मारा” रनवास की स्त्रियों को शकुन्तत्ना ही शकुन्तत्ना कहकर पुकारता है “। फिर त्नाज का मारा घुटने पर सिर रखकर बेठा रहता है ॥ मिश्रकेशो । (जाप ही जाप) यह बात तो मुझे बड़ी षारी लगी ॥ ०7 शा.] 830 07९१'७,4. पु द्वार० । इसी उदासी के कारण वसन्तोत्सव बरज टिया गया है ॥ दो" चेरी। यह बरजना बहुत योग्य है ॥ (नेषथ्य में) गेत्न करो । महाराज झआाते हैं ॥ द्वार० । (कान रूगाकए हे सखियो राजा आते हूं । अब तुम जाओ ॥ (दोनां गई) (दुष्पनन पछताता हुआ आया और आगे आगे एक कच्चुकी सौर साथ माठव्य खाया) द्वार । €उज़ा की ओर देखकर) सत्य है तेजस्वी पुरुष सभी अवस्था में शोभायमान होते हं । हमारे स्वामी यद्यपि उदासी में हैं तो भी केसे दिव्य दिखाई देते हैं। महाराज ने शज्जार का त्याग कर दिया है। ओर शरीर ऐसा दुबेत्न हो गया है कि भुजबंट सरक सरककर कल्नाई पर आता है। गहरी स्वास लेते लेते ' होठों की त्नाल्ली सूख गई है। आअोर जागने ओर चिन्ता करने से आंखें उनीदी हो रही हैं | तो भी अपने तेजों के गुण से ऐसे दीपिमान हैं मानो सान का चढ़ा हीरा ॥ मिश्रकेशी । (ुष्घ्ष की ओर देखकर आप ही आप) शकुन्तत्ना अपना अनाटर आर त्याग हुए पर भी इस राजा के विरह में व्यथित हो रही है। सो क्‍यों न हो ” यह इसी योग्य है ॥ तुष्पन्त । (बहुत सोच में आगे बढ़ल) हे सन जब पारी मृगनयनी ने तुरे खल्लेह की सुध दिखाई तब तू सोता ही रहा | अब पछताने को क्यों जगा है॥ मिश्य? । (ज्ञाप हो आप) वह अप्न्त में सुख पावेहीगी हल माढ्व्य । (जाप ही आप) हमारे राजा को .लेह की प्रवन के भोके ने फिर सताया। इस रोग की क्या ओषधी करें ॥ द्वार० । &ुष के पास जाक0 सहाराज की जय हो । में वन उपवनों को देख ञ्ाया । आप चत्नकर जहां इच्छा हो विश्वाम कीजिये ॥ टुष्य? । (डारपाल की बात पर कुछ ध्यान न देकए कज्बुकी तुप्त राजमन्त्री से कह 72 850 0 ४१'७।.3, [4०% शा, दो कि हमारा विचार कुछ दिल के लिये” लगर से चल्ने जाने का” है। इस से राजसिंहासन सूना रहेगा। जो कुछ काम काज प्रजासंबन्धी “ हो ल्लिखकर हमारे पास भेज दिया करें ॥ कच्चुकी । जो आज्ञा ॥ (बाहर गया) टुष्प० । ास्पाक से) पवेतायन तू अपने काम में असावधानी मत करियो ॥ द्वार० । जो आज्ञा महाराज की ॥ (बाहर गया) माढ० । अच्छा । तुम ने इस जगह को निमेत्ल किया । अब इस रमणीक कुञ्ञ में मन बहत्नाओ ॥ दु्धथ० । हे माढ्व्य जब कोई किसी को कुछ दोष लगावे ओर वह निरपराधी ठहरे तो दोष लगानेवात्ना केसा दुख पाता है | देखो मुनिसुता के लेह की सुध तब तो मुझे अज्ञान ने भुला दी । अब ठदुखदाई मनोभव अपने धनुष पर आम की मज़्री का नया तीर चढ़ाकर झ्ाया है ॥ माढ० । नक धीरज घरो । मनोभव के तीरों को अभी ल्नाठी से तोड़े डालता हू ॥ (आम कौ मन्नरियों को कूरन लगा) टुष्प० । (ध्यान करा हुआ) हां में ने ब्रझ्मा का कतेव्य जाना | (ाब्य से) कहो मिचर अब कहां बेठकर शकुन्तत्ना की उनहारि की लताओं। को देखूं ॥ माढ० । वही सखी जो चित्रविद्या में बड़त चतुर हे ओर जिस से आप ने कहा था कि इस माधीकुञ्ञ में बेठकर हम मन बहलावेंगे आती होगी ओर महारानी शकुब्तत्मा का चित्र भी आप की आज्ञा- नुसार / त्वावेगी ॥ दुष्य* । चत्नो । षारी के चित्र ही से मन भर जायगा। कुज्ञ की गेत्न बताझो ॥ माढ० । इस गेल आझो मिच । (दोनों चले और पौछे पोछे मिश्रकेशी भी चली) यह माधीकुज्ञ जिस में मणिजटित पटिया बिछी है यद्मपि निर्जीव हे 4८५ शा. 6५ ए४"7१'४५./. 73 है तो भी ऐसी दिखाई देती है मानो आप का आदर करती है। जआाश्ो | चत्नकर बेठें ॥ (दोनों लहाकुज्न में बेठ) मिश्रकेशी । (जप ही आप इस त्नता की ओट में बेठकर शकुन्तत्ना का चित्र देखंगी । ओर फिर उस के पति का सचा लेह जाकर उस से कह टूंगी ॥ (छह की चोट में बैठ गई) टुष्य० । (डी खास भस्के) है रिच अब मुझे शकुत्तत्ना के प्रथम मित्नाप की सब सुध आ गई है| तुकू से भी तो में ने उस का वच्चान्त कहा था । परंतु जिस समय में ने उस का अनादर किया तब तू मेरे पास न था । तें ने भी कभी उस का नाम न त्निया। सो क्या तू भी उसे मेरी ही भांति भूत्न गया था ॥ मिश्र? । (आप ही आप) राजाओं को एक घड़ी भर भी अकेला न छोड़ना चाहिये ॥ माढ० । नहीं नहीं । में नहीं भूल्ला हूं । परंतु जब आप सब वृच्नान्त कह चुके थे तब यह भी तो कहा था कि यह लेह की कहानी हम न मन बहत्नाने को बनाई है। ओर में ने ञ्राप के कहने को अपने भोल्ने भाव से प्रतीत कर त्निया था ॥ मिश्नर० । ज्ञाप ही आप) सत्य हे ॥ दुष्य० । «यान करके) हे माढव्य इस टुख से छुड़ाने का कुछ उपाय कर ॥ माढ० । ऐसा “ तुम को क्या नया दठुख पड़ा है । इतना अधीर होना सत्पुरुषों को योग्य नहीं है। देखो पवन केसी ही चल्मे” पवेत को नहीं डिगा सकती है ॥ टुष्घ० । सखा जिस समय में ने णारी का त्याग किया उस की ऐसी दशा थी कि अब उस को सुध करके में व्याकुल् हुआ जाता 8“। हाय जब उस ने अपने साथी ब्राहझ्रणों के पीछे चलने को मन किया कआ्षि के चेल ने भिड़ककर ” कहा कि यहीं रह | फिर भी एक बेर यारी ने मुझ नि्देई की ओर आंसूभरे नेतों से देखा । ॥#] 74 847 ए४१७।.४. [4० हा, अब वही दृष्टि मेरे हृदय को विष की बुकी “ भाल के समान छेटती है ॥ मिश्र० । (आप ही आप) देखो अपना प्रयोजन केप्ता होता हे कि इस का दुख सुनना भी मुझे सुहाता है ॥ दुष्प० । मिच बिचारो तो. उस अप्सरा को कोन ल्ने गया ॥ माढ० । जो इतना ही जानता ” तो अब तक तुम्हारा दुख क्यों न टूर कर देता | झ्ाप ही बिचारो ॥ दुष्प० । ऐसी पतित्रता को डिगाने की सामथे ओर किसी में न थी । उस की मा मेनका सुनी है। सो मेनका ही की सखियां त्ने गई होंगी ॥ मिश्र" । (छाप ही आप) शकुन्तत्ना का त्यागना जाग्रद्वस्था का काम नहीं है। स्वप्न में हुआ होगा ॥ माढ० । मित्र जो यही बात है तो उस के मिलने में कुछ वित्ग् मत जानो ॥ टुष्प० । क्यों । यह तुम ने कैसे जाना ॥ माढ० । ऐसे जाना” कि मा बाप झपनो बेटी को पतिवियोग में बड़त काल नहीं देख सकते हैं ॥ दुष्प० । क्या उस समय मुझे निद्रा थी या कुछ माया थी या मेरी मति भज्ज हो गई थी या मेरे कर्मो ने पत्नटा त्निया था। कुछ हो " यह निश्चय हे कि जब तक फिर शकुन्तत्ना न मिलेगी ' में दुख के सागर में डूबा ही रहंगा ॥ माढ० । निरास न हजिये। देखो मुट्री ही दृष्टान्त इस बात का है कि खोई वस्तु फिर मित्न सकती है। देवेच्छा सदा बत्नवान हे ॥ टुष्प० । 'ुदरी को देखकर मुझे इस मुदरी का भी बड़ा सोच हे । यह ऐेसे स्थान से गिरी है जहां फिर पहुंचना टुतल्लेभ है। यह बड़ी मंदभागी है ज्योंकि उस कोमत्न उंगली में जिस के नखों की त्लाली चुन्नी की ट्सक को फीका करती थी पहुंचकर फिर गिरी ॥ #८० शा.] 647 ए४१५].,8. प5 मिश्व० । (आप ही आप) जो किसी ओर के हाथ पड़ती तो निस्संदेह इस मुदरी का भाग्य खोटा गिना जाता ॥ माढ० । कृपा करके यह तो कहो कि यह अंगूठी शकुन्तत्ना की उंगत्नी तक क्योंकर पड़ुंची ॥ मिश्च० । आप ही चाप) में भी यही सुना चाहती थी ॥ दुष्य० । सुनो । जब में तपोवन से अपने नगर को चलने त्वगा तब प्यारी ने आंखें भरके _ कहा कि आयेपुत्र फिर कब सुध ल्ोोगे ॥ माढ० । भत्ना फिर ॥ टुयअ० । तब यह अंगूठी उस की उंगली में पहनाकर में ने उच्चर दिया कि इस के अछारों को तू एक एक कर “ प्रतिदिन गिनियो। जिस टिन पिछला अश्षर गिनती में आावे उसी दिन जानना कि आज रनवास से कोई त्निवाने आवेगा। परंतु हाय मुक् निदेई को यह सुध नरही॥ मिश्र० । (आप ही जाप) इन के वियोग ओर संयोग में तीन दिन का अन्तर बहुत अच्छा ठहरा था। परंतु ब्रह्मा ने बिगाड़ दिया ॥ माढ० । फिर वह मुदरी मछल्नी के पेट में केसे गई ॥ टुष्प० । जिस समय प्यारी ने सचीती्े से आचमन को जत्न लिया तब जल में गिर पड़ी होगी ॥ माढ० । ठीक है ॥ मिश्र? । (आप ही जाप) जझ्याहा यही बात हे कि राजा ने अधमे से डरकर अपने विवाह का संदेह किया । परंतु आश्यये हे कि फिर उसे मुदरी से क्योंकर सुध हुई ॥ दुष्य०। में इस मुद्री को कुछ बुरा कहा चाहता हूं ॥ माढ० । (आप ही आप) राजा उन्मच् हो गया है। ७ण्णे सो ई में भी अपनी त्नाठी से कहा चाहता हूं ॥ टुष्य० । क्यों माढ्व्य । तुम त्लाठी से क्यों बुरा कहा चाहते हो ॥ / 76 84॥ ए १७.४. [480०५ शा, माढ०। इस त्निये कि मेरा अड्ग तो टेढ़ा है और यह ऐसी सीधी बनी है। बड़ी धृष्ट त्नाठी है ॥ दुष्य० | (उस को बात पर कुछ ध्यान न देकर) हे मुदरी तुके क्योंकर उस हाथ से गिरते बना ” जिस में कोमत्न उंगली कमलों को लजाती थी। यह तो अज्ञान है। इस से क्या कहं | में ने ज्ञानवान होकर अपने जीवनमृत्न को क्यों त्यागा ॥ मिश्व०। (आप ही आप) / म॑ कहा चाहती थी सो ई इस ने कही ॥ माढ० । (आप ही चाप) जब तक यह सोच में है तब तक मुक्के भी यहां ठहरना ओर भूखों मरना ” पड़ा ॥ दुष्घ० । हे णारी में ने तुझे निष्करण त्यागा। अब फिर कब दशेन देकर हृटय के पश्चात्ञाप को मिटावेगी ॥ (एक सखी चित्र हाथ म॑ लिय आई) सखी । महाराज देखिये । महारानी का चित्र यह हे॥ (चित्र सामने दिखाती हुई) टुष्प० । (धचत्र को देखकर) हां यही पघयारी का सुन्दर मुख है। ये ही कटीत्ने नेत्र हैं। ये ही मधुर मुसक्यानभरे अधर हैं जिन की त्वाल्ली बिखाफन को लजाती है । प्राणयःरी का मुख ऐसा बना है मानो अभी बोत्ल उठेगी ” । बदन की कान्ति अनेक रज्ञों में छपी प्रीति के बाण छोड़ती है ॥ माढ०। सत्य है। यह चित्र ऐसा स॒हावना लगता हे मानो साश्षात क्रामदेव झ्रागे खड़ा हे। हे मिच्र मेरी आंख नख से शिख तक“ इस के प्रत्येक अड्भ की शोभा देखने को त्जाती ह । इस चिच्रदशेन से मुझे ऐसा आनन्द होता है मानो शकुन्तत्ना ही से बतें कर रहा हूं ॥ मिश्र? । (जाप ही आप) अच्छा चिच बना है। इस में शकुन्तत्ना ऐसी टिखाई देती है मानों आंखों के सामने खड़ी है ॥ तुष्प० । फिर भी चिच उस के रूप को कहां पाता है। हां जो कुछ न्यूनता इस में रह गई हैं उस को जब में अपने मन की कल्पना“ 4८7 १].] 68500४१७॥.,8. 77 से पूरा कर लेता हुं तब यह पारी की मोहनी मृति की छाया देता है ॥ मिश्र? । (आप ही जाप) जेसी प्रीति हे वेसा ही पछतावा भी है ॥ दुष्प० । (आह भरकर) हाय जब वह जाप मेरे संमुख आई तब में ने अनाट्र किया । अब उस के चित्र को इतना संमान देता हूं। मेरी गति उस बटोही की सी है जो नदी को त्याग प्यास का मारा मृगतृष्णा को दौड़ता है ॥ माढ० । यहां तो इतने चिच लिखे हैं जाती महारानी शकुन्‍्तत्ना कोन सी है ॥ सिश्च० । (जाप ही आप) इस बढ़े को शकुन्तत्ना के सुन्दर रूप का ज्ञान नहीं हे । इस से जान पड़ा कि जिन आंखों की ठगोरी में यह राजा बेसुध हुआ है उन की छाया इस पर कभी नहीं पड़ो ॥ टुष्य० । भल्ना बततल्लाओ तो इन चित्रों में से तुम किस को शकुन्तत्ना मानते हो ॥ माढ० । (बित्रों को देखकरे सोच त्नूं तब बतत्नाऊंगा। तो यही शकुस्तत्ना है जिस का शरीर थका हुआ दिखाई देता हे। वस्त्र ढीत्ने हें । बांह शिथिल्नाई से गिरी पड़ती हैं । पसीने की बुंद मुख पर ढत्नक रही हैं । अत्नकां से फूल गिरते हैं । ओर इस डहडहे आम के नीचे चोकी पर बेठी है। यही महारानी होगी ” ओर आसपासवाली सखी सहेत्नी होंगी ” ॥ दुष्घथ० । माढव्य तू बड़ा प्रवीन है | परंतु देख | कअभो इस चिच में कुछ कसर" है । देखो | रह्ञ अच्छा नहीं भरा है। नहों तो गालों पर आंसू की सी बूंद न गिरती । में ने णारी को विल्नाप करते टेखना नहों चाहा था । (चित्रबनानेवाल्त रे) हे चतुरिका अभी यह चित पूरा नहीं बना हें। जा फिर चित्रालय से बनाने की वस्तु त्नेझा॥ 86 कि मेरे ध्यान में नहीं 78 84 7 ए१५॥,8. [4८% शा, चतुरिका । माढ्व्य तुम कृपा करके चित्र त्िये“ रहो । तब तक में महाराज की आज्ञा बजा” त्नाऊं॥ दुष्प० । नहीं । तुम जाझो | हमी” लिये रहेंगे ॥ (राजा ने चित्र ले लिया ओर चत॒रिका गई) माढ० । आप ही भाप) तुम तो निमेल जलन की भरी नदी को छोड़ मृगतृष्णा को दौड़ते हो । गे महाराज इस में क्या कसर है ॥ मिश्र० । (आप ही जाए) मरे जान” तो अब राजा उन बातों को भी ल्लिखावेगा जिन से तपोवन में शकुन्तत्ना के रहने का स्थान सुशो- भित था ॥ दुष्प० । सूनो सखा। में चाहता हूं कि इस चित्र में मात्निनी नदी बनाई जाय । उस की रेती में हंसों के जोड़े चुगते दिखाई दें। फिर आगे बढ़कर हिमालय पवेत की तराई त्निखी जाय जिस में हरिणों के भूंड चरते हों । और एक ओर वुषक्ष खड़ा हो | उस वृश्य की डाल्नियों पर छात्न के वस्त्र धूप में सूखते हों । ओर एक हरिणी खड़ी अपनी बाई आंख को धीरे धीरे करसालय के सींगों से खुजा रही हो ॥ माढ० । “ तुम चाहो सो लिखा लो । मेरे जान“ तो जितनी ठौर विना लिखी रही है इस में मुझ्ी सी कुबड़ी तपस्विनी लिखानी चाहिये” ॥ टुष्प० । (उस को बात पर ध्यान न करके) में यह कहना भूल ही गया ” कि पारो के चित्र में कुछ झाभूषण भी लिखने चाहिये ॥ «८.२७. १02 माढ० । केसे ” ॥ मिश्र" । (आप ही आप) ऐसे ” जैसे वनयुवतियों के “ होते हैं ॥ दुष्य० । टेखो । चित्रबनानेवात्नी णारी के कान पर शिरस का गुछा रखना ओर कपोल्नां पर फूलों का भुप्पा लटकाना भूल गई है। ओर छाती पर शरचक्नन्द्र की किरण के समान कोमल कमल्न को डांड़ियों का हार भी बनाना रह गया हे ॥ 4०% शा] 557 ए ४१ ७॥,5. 79 माढ० । मित्र यह रानी अपने आधे मुख को पहुज सी हथेत्नी से छपाए चकित सी क्यों हो रही है । आहा में जान गया “। एक भांरा मुख को कमत्न जान बेठा चाहता है ॥ दुष्प० । इस धृष्ट भोरे को टूर करो ॥ माढ” । महाराज सब धूष्टठों को दण्ड देने की सामथ्ये आप ही को हे॥ दुध" । अरे भोंरे तू तो फूली लताओं का पाडना है। तू यहां अनाटर होनें क्यों झाया । देख । वहां जा जहां तेरी भोंरी भूखी प्यासी फूल पे बैठी बाट हेर रही है। विना तेरे रस नहीं ल्लेती ॥ मिश्ञ०। जाप ही आप) यह वचन है तो निरादर का। परंतु अच्छा कहा॥ माढ० । महाराज भोंरे की ढिठाई तो प्रसिद्ध हे ॥ दुष्य० । (रस होकर! रे भोरे जो तू मेरी णारी के होठों को छूवेगा तो कमल के उटर की बंधि में डात्ना जायगा। नहीं मानेगा ॥ माढ० । जब तुम ने शेसा कड़ा दण्ड कहा तो क्यों न मानेगा । (हंसकर आप ही आप) यह तो सिड़ी हो गया है। इस के साथ रहने से मेरी भी दशा इसी की सी हुई जाती है “ ॥ दुध० । झरे में आज्ञा दे चुका। फिर भी तू नहीं हटता ॥ मिश्र" । (आप ही आप) प्रीति की अधिकाई में चतुर मनुण भी मूख्खे हो जाते हैं ॥ माढ? | सखा यह चित्र का भोंरा है ॥ मिश्च०। आप ही आप) झाहा इस का इतना बेसुध होना यह चित्रविद्या की निपुनता का गुण है ॥ दुष्य० । हे निदेई में तो प्राणयारी के दशन का सुख तल्नेता था । तू ने क्यों सुध दित्नाई कि यह चित्र है ॥ (रोता हुआ) मिश्र०। (आप हो आप) वियोगियों की यही दशा होती है। तब इस को सब झोर कणटक ही दिखाई दंते हैं ॥ 80 $00 ए४१७.8. [4८४ शा, दुष्प९ । अब में इस भारी व्यथा को केसे सह्ूं। जो चाह्नं कि णयारो से स्वप्न में मित्मूं तो नींद नहीं आती । ओर चित्र में देखकर मन बहत्नाऊं तो आंसू नहीं देखने देते ॥ मिकन० । आप ही आप) शकुन्तत्ना को त्यागने का कलइू राजा के सिर से अब इस विलाप ने घो दिया ॥ (चत॒रिका फिर आई) चतुरिका | महाराज जब में रज्ञों का डिब्वा ल्वेकर चली तभी . . . . ॥ टुष्प" । (शीघ्ता ऐ) तब क्या हुआ ॥ चतु० । तभी महारानी वसुमती पिज्ञत्ला को साथ लिये आई ओर मेरे हाथ से डिब्रा छीनकर कहा कि डिब्वा ला । झसे में ही महाराज को चल्नकर दूंगी ॥ माढ० । भत्ना इआआ जो तू बच आई ॥ चतु०। रानी का वस्त्र एक कांटे के वृक्ष में अटक गया। उसे छुड़ाने मं पिड्ला ल्गी। तब तक में निकत्न आझाई॥ दुध० । हे सखा माढव्य में रानी वसुमती का मान बहड़त रखता हूं । इस से गवित हो गई है । अब चित्र छुपाने का उपाय कर ॥ माढ० । (आप ही आप) तुम ही छापा तल्नो तो अच्छा है (यह कहकर चित्र को लेकए उठा) । (प्रग) जो तुम मुझे रनवास की ऊंची भीति पर चढ़ा दो तो इस चित्र को ऐसा छुपाऊं कि कोई न देख सके ॥ (बाहर गया) मिश्र०। (आप ही आप) आाहा राजा अपने धमे को केसा पहचानता है कि यद्यपि दूसरी पर आसक्त हैं तो भी अपने अगत्ने वचन का निवेोह करता है ॥ (एक ट्वारपाल पत्र हाथ में लिये आया) द्वारपाल | महाराज की जय हो ॥ _ दुघ०। द्वारपाल तुम ने इस समय महारानी वसुमती को तौ नहीं देखा है ॥ 4८५ ए.] 847 ए४१५॥.,४. शञ द्वार" । हां महाराज मुक्े मित्नी तो थीं। परंतु मेरे हाथ में चिट्ठी देखकर उल्लटी ल्लीट गईं ॥ तुष्प० । रानी समय को पहचानती हे ओर मरे राज काज में विघ्न डालना नहीं चाहती ॥ द्वार” । महाराज मन्त्री ने यह बिनती की है कि आज मुक को रूपया सम्हारने के काम से ” ञझ्वकाश न था। इस लिये केवत्न एक ही पुरकाये किया है । सो बड़त सावधानी से इस पत्र में त्निख दिया हैं। आप कुपा करके देख त्नें ॥ दुष्प०। पत्र मुझे दो। (पत्र छेकर पढ़ने छऊग) महाराज के चरणों में यह निवेदन है “ कि धनवुद्ध नाम एक बड़ा साह्कार था। उस का बेटा मारा गया ओर वह भी समुद्र में डूब गया । कोई पत्र उस के” नहीं हे ओर धन बहुत छोड़ा है । महाराज की ज्ाज्ञा हो तो वह धन राजभणरडार में रखा जाय । (शोक रे) आह निपत्री होना मनुष्य को कैसी बुरी बात है | परंतु जिस के" इतना धन था उस के “स्त्री भी बढ़त होंगी। इस लिये पहत्ने यह पूछ त्लेना चाहिये कि उन स्त्रियों में से कोई गर्भवती है या नहीं ॥ द्वार० । में ने सुना हे कि उस के” एक स्त्री साकेतक सेठ की बेटी के इन दिनों गरभाधान के संस्कार हुए हैं ॥ टुष्य* । यद्यपि बालक अब तक गभेसस्‍थ ही होवे तो भी अपने पिता के धन का वही झअधिकारो होगा । जाओ मनन्‍्त्नी से हमारी यह ज्ाज्ञा कह दो ॥ द्वार० । जो आज्ञा ॥ (बाहर गया) दुष्प० । ठहरो तो ॥ द्वार० । (फिर आकर) ज्प्ाया ॥ टुष्य९। चाहे साह्कार के / संतान हो चाहे न हो उस का धन राज में लगाना न चाहिये। जाओ यह ढंढोरा नगर में कर दो कि मेरी 000 82 8 40 07४१'७.4. [4८५ १], प्रजा मं” जिस किसी को किसी प्यारे बांधव का वियोग हो वह दुष्यन्त को झपना धमे का बांधव समझे ॥ दइार० । यही ढंढोरा हो जायगा ॥ (बाहर गया) (दृष्पनन सोच में बेठा हुआ। ड्वारपाल फिर आया) द्वार" । महाराज आप की अज्ञा की नगर में बड़ी बड़ाई हुई ॥ टुष्य० । (गहरी सांस भरकर) जब कोई बड़ा मनुष्य विना संतान मरता है तो उस की संपन्चि यों ही बिराने घर जाती है। यही वृत्नान्त किसी दिन पुरुवंशियों कें संचय किये धन का होना हे ॥ द्वार” । ईश्वर ऐसा अमड्त्न न करे ॥ (बाहर गया) दुय० । धिक्कार है मुझ कि में ने प्राप्त हुए सुख को त्नात मारी ॥ मिश्व० । (जाप ही आप) निश्चय इस ने यह अपनी निन्‍दा अपने जी से की होगी ॥ दुष्प० । हाय में बड़ा अपराधी हू कि में ने अपनी धमेपत्नी को जो किसी दिन पुरूवंश की प्रतिष्ठा होती ऐसे त्याग दिया जेसे कोई अपनी बोई धरती को फल्न आने के समय छोड़ दे ॥ मिश्र" । (जप ही आप) सब ने तो नहों छोड़ दिया। क्या आश्चये हे कि फिर तुरे मिलने ॥ चतुरिका। (आप ही जाए) मन्त्नी नि्देई ने उत्पात का भरा पत्र भेज राजा को क्या दशा कर दी है। देखो आंसुओं से बहा जाता है ॥ दुष्य* । हाय मेरे पितरों को नित्य यह खटका त्नगा रहता होगा कि जब टुष्यन्त संसार से उठ जायगा तब कोन हम को पिणइ देगा * । मेरे पीछे कोन इस वंश के अाइह्वादिक करेगा। हाय ऋब तक तौ मेरे कुल के निपुत्री पितरों को मेरे हाथ से वस्त्र का निचोड़ा जल तो भी मित्न जाता था | फिर यह भी न मिल्नेगा ॥ मिश्व० । (जाप ही आप) राजा की झांखों पर इस समय मोह का ऐेसा अज्वत्न पड़ा हे मानो सुन्दर दीपक की ज्योति में अंधेरा सूमे ॥ 4०८० ए.] 85587 05७४१०५.3. 88 चतु० | महाराज इतना शोक न कीजिये | अभी ञ्आप की तरूण अवस्था है । आप की रानियों के आप ही से यशस्वी पुत्र होंगे ओर आप के पितरों को दुख न मिलने देंगे॥ दुष्य० । €ुख के) पुरु का वंश अब तक तो फत्ना फूल्ना ओर शुद्ध रहा । परंतु अब मुरे प्राप्त होकर समाप्त हुआ ” जसे सरस्वती नदी ऐसे देश मं जो उस की पवित्र धारा को बहने योग्य न था जाकर लोप हुई हट 6 ॥ (मित्र हो गया) चतु० । (जाप ही आप) महाराज सावधान हजिये ॥ मिश्च० । (आप ही जाप) में चत्नकर संभालूं। नहीं । आप ही चेतन्य हो जायगा। में ने देवजननी अप्सरा को शकुन्तत्ना से यह कहते सुना था कि जेसे देवता अपना यज्ञभाग पाकर प्रसन्न हो जाते हैं तू भी अपने पति के ल्लेह से शीघ्र ही आनन्द पावेगी ॥ (उठकर चलो गई) निषथ्य में) क्या ब्राह्मण की रपछ्ला करनेवात्ना कोई नहीं रहा ॥ टदुष्प० । (सावधान होकर और कान लगाकर) हऋप्रहा यह कोन माठ्व्य सा ठुहाई दे रहा है। कोई है। कोई है ॥ चत॒० । हो न हो ” रानी की पिज्ञत्ना इत्यादि सहेल्वियों ने उस को चित्र हाथ मं ल्निये झा पकड़ा हे ॥ दुष्य०। चतुरिका तू जा मेरी ओर से रानी को लतल्वकारकर कह दे कि अपनी सखियों को क्यों नहीं बरजती हे ॥ चतु०। जो आज्ञा महाराज की ॥ (बाहर गई) (फिर नेषथ्य में) मे ब्राह्मण हूं। मेरे प्राण मत ल्ने ॥ तुष्य०"। निश्चय यह कोई ब्राह्मण आपत्ति में फसा है। हय रे कोई यहां॥ (बढ़ा चोबदार आया) चोबटार। महाराज की क्या आज्ञा है ॥ टुष्प" । देखो तो माढव्य का गला किप्त ने पकड़ा है ॥ चोब०। ज्भी समाचार लाता क्व॥ (बाहर गया और फिर कांपता हुआ झाणो ४2 54 887 00०१५.8, [4०% शा, टुष्प० । कहो पवेतायन क्या हे ॥ चोब०। महाराज बड़ा उत्पात है ॥ दुष्प० । तू कांपता क्यों है । बुढ़ापे में मनुष्य की कया गति हो जाती है। डर से बूढ़े मनुण का शरीर ऐसं थरथराता है जैसे पवन लगने से पीपत्न का वुश्ष ॥ चोब०। अपने सखा को छुड़ाओ ॥ दुष्य० | छूड़ाओ । काहे में से ॥ चोब०। आपतन्नि में स ॥ टुष्य० । क्या कहते हो ॥ चोब०। वह भीति जिस से आकाश के चारों कोने दिखाई देते ओर बादलत्नों के मित्मे रहने से मेघच्छन्द कहत्नाती है . . . टुष्य" । सो क्या ॥ चोब०। उस भीति की मुड़ेत्न से जहां नोलगम्रीव कपोत का भी पहुंचना कठिन है एक पिशाच ऐसा आया कि किसी की दृष्टि न पड़ा” झोर आप के सखा को ते जाकर उसी भीति पर रख दिया ॥ दुष्य० । ७6ुरंअ कर) हय मेरे रनवास में भी पिशाच रहते हैं । सत्य है राजा को अनेक विधम्न होते हें । राजा उन उत्पातों को भी नहीं जानता है जो उसी के अधमे से प्रतिदिन और प्रति छिन राजभवन में ढआ करते हैं । फिर वह क्योंकर जान सकता है कि मेरी प्रज्ञा सुमागे में चल्नती है या कुमागे में । ओर जब राजा के कमे आप ही निरद्डुश हों तो वह प्रजा के कर्मा को किस भांति सुधार सकता है ॥ नेष्ष्य मं) चत्मियो चलत्नियो ॥ दुष्य० । 'सुनता और दौइता हुआ) डरो मत मित्र । कुछ भय नहों है ॥ लेषष्य में) भय क्यों नहीं है। भूत तो मेरा कण्ठ पकड़े ' कल्नेजा ऐंठे “ डालता है ॥ 48८५ शा.] 5847 0४१'५॥,8. श्ठ टुष्प० । (चारों चोर देखता हुआ) हाय रे कोई मरा घनुष त्नावे ॥ (शक हारपाल राजा का धनुष बाण लेकर आया) द्वारपात्व । महाराज धनुष यह है ॥ €ुषघक्त ने धनुष बाण ले लिया) (ेष््य में) तेरे कण्ठ के ल्नोह् का” घयासा में तुरे ऐसे पछाडंगा जसे सिंह पशु को मारता है। अब बतल्ना दुखियों की रक्षा के लिये धनुष- धारणकरनेवाल्ा दुष्यन्त कहां है जो तुके बचावे ॥ दुष्घ९ । (क्रोष से) यह पिशाच तो मुझे भी चिनोती देता है। अरे नीच खड़ा रह । में झाया “। अब तेरी मृत्यु समीप पहुंची । (धनुष चढ़ाकर) पवेतायन छत्च की गेत्तन बताओ ॥ द्वारपाल । गेल यह है महाराज ॥ (सब तुरंत बाहर गये) [स्थान एक बड़ी चोड़ी छत्न] (दृष्पनन आया) टुष्प० । (चारों ओर देखकर) हाय यहां तो कोई नहीं है ॥ (नेषब्य में) बचाओझो । कोई मुझे बचाओ | महाराज में तो तुम्हें देखता हूं। तुम ही मुक्के नहों देख सकते हो । इस समय में ऐसा हो रहा हूं जैसे बित्वाव का ग्रसा चूहा ॥ दुध्घ* । मुझे तू नहीं सूकता है। तो क्या हुआ “| जिस अन्तध्योन- विद्या के बल से बेरी ने तुके ल्लोप कर रखा है उस को मिटाकर मेरा बाण बेरी को देख तल्लेगा। माठ्व्य सावधान रहो । और तू अरे पिशाच मेरे शरणागत को न मार सकेगा। देख ऋब में यह बाण चढ़ाता हूं । यह तुके बेधकर ब्राह्मण को ऐसे बचा लेगा जेसे हंस पानी में से टूथ को निकात्न त्नेता हे ॥ (धनुष ताना) (मातलि आऔर माठव्य सार) मातत्नि। महाराज इन बाणों के लिये आ्आप के मित्र इन्द्र ने असुर बता टिये हैं। उन ही पर धनुष खेंचों । मिचों पर ल्ेह की टृष्टि चाहिये ॥ 86 80 05४१'५],&, [८५ शा, दुष्य? । (चकित होकर सअस्त्र रख लिया) हझप्ाहा इन्द्र के सारथी तुम भत्ने ज्पाए॥ माठव्य । हाय यह तो बधिक की भांति मुझे मारे “ डालता था । ज्ञाप इस का आदर करते हो ॥ मातत्नि | (ुसक्बाकर महाराज में इन्द्र का संदेसा त्वेकर आया हंं। सो सुन त्नो ॥ दुष्प० । कहो । में कान लगाकर सुनता हूं ॥ मातत्नि | कालनेमि “ के वंश में दानवों का ऐसा हुआ है कि उस का जीतना इन्द्र को कठिन हो रहा है ॥ दुपघ० । यह तो में ने आगे ही नारद“ से सुन लिया है ॥ मातलत्रनि | ऐसे शत्रुवंश को जब सोयज्ञकरनेवात्ना देवनायक न जीत सका तब जेसे सूये रेन का अन्धकार मिटाने को असमथे होकर चन्द्रमा से सहायता लेता है तेसे ही तुम को अपना मित्र जान बुल्वाया है। सो महाराज इस रथ पर चढ़ो ओर धनुष लेकर विजय को चल्नो ॥ दुष्प* । देवराज ने मेरे ऊपर बड़ी कृपा की है। इस से में सनाथ हुआ “। परंतु तुम यह कहो कि मेरे सखा माढव्य को तुम ने इतना क्यों सताया ॥ माततल्नि। ञ्राप को बह्त उदास देखकर चेतन्य करने के त्रिये में ने रोस टिल्ाया था। क्योंकि जेसे काठ गिरने से अग्नि का तेज बढ़ता है ओर छेड़ने से सपे फण उठाता है ऐसे ही तेजस्वी पुरुष छोह टिल्नाने से पराक्रम टिखाते हैं ॥ टुष्य० । (ाव्य से होले) हे सखा देवपति की आज्ञोलछ्नन “ योग्य नहीं है । इस से तुम जाकर यह समाचार मन्त्री को सुना दो और कहो कि जब तक मेरा धनुष टूसरे काये में प्रवृत्त रहे तब तक अपनी बुद्धि से “ प्रजा की रघ्या करे ॥ ६९) एक गण प्रबत्न #0०7० शत].] 84 00४१७॥,8. हैः माढ० | यह तो कह टूंगा । परंतु मेरा गल्ना घोंटे बिना मातत्लि अपना संदेसा भुगता देता तो इस का / क्या बिगड़ता ॥ मातत्निि। रथ पर चढ़ोी महाराज ॥ (दृष्घन् रथ पर चढ़ा और मातलि ने रथ हांका) आड़ 9 स्थान आकाझ के बादल ॥ (इन्द्र का काये करके टुष्पन ओर मातलि रथ पर चढ़े आकाश से उतरते हुए) दुष्यन्त | हे मातलत्नि में ने इन्द्र की आज्ञा पाली । सो यह बात तो कुछ ऐसी बड़ी न थी जिस के त्निये मुके इतनी प्रतिष्ठा मित्नी ॥ मातत्नि। (हंसकर टोनों को यही संकोच हें। ञझ्ाप ने इन्द्र के साथ इतना बड़ा उपकार किया है तो भी तुझछ ही मानते हो । शेसे ही आप के करतब के सामने देवराज ल्लज्जित हो रहा है ॥ दुष्प० । ऐसा मत कहो । इन्द्र ने मेरा बड़ा सत्कार किया कि मुके अपनी आधी गद्दो पर देवताओं के देखते जगह दी। ओर अपने पुत्र जयन्त' के सामने जिसे इस बड़ाई के मिलने की अभिल्नाषा थी मेरे इृटय पर हरिचन्दन त्नगाकर गल्ने में मन्दार की मात्ना डाल्नी ॥ मात । हे राजा इन्द्र से जाप किस किस सक्कार के योग्य नहीं हो । सवगे को दो ही' ने देत्यों के कण्टक से छुड़ाया है। एक तो आगे नरसिंह के नखों ने ओर ञब आप के तीछूण बाणों ने ॥ टुष्प० । हम को यह यश उन ही देवनायक की कृपा से मित्ना है। क्योंकि संसार में जब कोई बड़ा काये जअाज्ञाकारियों से बन पड़ता है तो स्वामियों की बड़ाई का पुण्य समभ्दा जाता है | क्या अरुण को सामथ्ये थी कि रात्रि के अन्धकार को टूर करता कदाचित' सूये 5पने जझागे उस को रथ पर आसन न देता ॥ 88 ५30 (९॥॥ ४ ४९ [#८7 शा, मात" । ञझाप को ऐसा ही कहना उचित है। (रघ को होले होले चलाया) है राजा अपने स्वगे तक प्राप्त हुए यश की गुरुता देखो । जिन रह्लों से सुरसुन्दरी अद्भराग करती हैं उन ही से देवता आप के चरितों को कल्पलता के पन्नों पर स्वगे के गाने योग्य ' गीतों में त्निख रहे हं॥ टुष्य० । (नम्ता से) हे मातत्नि दानवों को जीतने के उत्साह में इधर से जाते हुए में ने इस शुभ स्थान को भत्मी भांति नहीं देखा था .। अब तुम कहो इस समय पवन के कोन से मागे में ” चल्नते हैं ॥ मात"। यह वही मागे है जिस में आकाशगज्ञा' के तट पर सूये चत्नता है और सब तारागण घूमते हैं । यह मागे परिवह ' पवन का है जो नछ्षत्र महों का आधार है । ओर यही मागे विष्णु का टूसरा पड था जब कि हरि ने अहझ्गरी बत्नि को छत्ना था ॥ दुष्प० । यह शोभा देख मेरे रोम रोम ' प्रसन्न हो गये हूं। (पहियों को देखकर) ज्यब हम मेघों के मागे में चलते हैं ॥ मात? । यह आप ने क्योंकर जाना ॥ टुष्प० । रथ ही कहे देता है कि अब हम जल्मभरे बादल्नों में चत्नते हैं क्योंकि पहिये भीगे हैं ओर इन्द्र के घोड़ों के अड्भज बिजली से चमकते हैं। में देखता हूं कि कोल्नाहल्न करते हुए चातक ऊंचे ऊंचे पहाड़ों की चोटियों से अपने घोंसत्ने छोड़ छोड़ नीचे उतरते हैं ॥ मात" । ठीक है । अभी एक छ्ण में आप अपने राज्य में पहुंचते हो ॥ दुष्प० । (नीचे को देखकर) स्वगे के घोड़ों के वेग से उतरने में यहां समस्त अचरज सा दिखाई देता हे । अभी पृथी यहां से इतनी दूर है कि पहाड़ के शिखर ओर घाटों में कुछ अन्तर नहीं जान पड़ता ”। वृक्ष पत्रहीन से दृष्टि आते हैं नदियां श्वेत रेखा के समान दीखती हैं भूमणइत्न ऐसा सूकता है” मानो किसी बल्नी ने ऊपर को गेंद बनाकर * उछाल्न दिया है ॥ 4८१ ५।.] 558 ए ४१ ५].,&. 89 मात० । (पृष्ठी को आदर से देखकए हे राजा देखो मनुष्यत्तोक केसा वेभव- मान टिखाई देता है ॥ दुष्प० । मातत्नि बतल्लाओ तो यह कोन सा पहाड़ हे जो एवे ओर पश्चिम समुद्रों के बीच में सोने का सा कटिबन्ध टिखाई देता हे ओर संध्या के मेघ के समान सुवर्ण की सी धारा बरसता है ॥ मात" | महाराज यह गन्धर्वों का हेमकूट नाम पवेत है । सृष्टि में इस से उच्चम कोई स्थान तपस्यासिद्धि करने के लिये नहीं है। इसी में मरीचि का पत्र ब्रह्मा का पोच्र देवदानवों का पितर कश्यप“ अपनी स्त्री अदिति समेत तपस्या कर रहा हे ॥ दुष्प० । (त्रड्ा से ) कल्याण प्राप्त करने का यह अवसर चूकने योग्य नहीं हे। आशञ्ओो उन को प्रणाम करके चल्नेंगे ॥ मात" | बहुत अच्छा । यह विचार आप का अति उचन्चम हे। अब हम पृथी पर आ गये ॥ दुष्घ० । आश्ये से) रथ के पहियों का कछ भी आहट न हुआ । न कुछ धूत्नि उड़ी । न उतरने में थकावट हुई ॥ मात । हे राजा आप के आर इन्द्र के रथ में इतना ही अन्तर है ॥ टुष्प० । कश्यप का आश्रम कहां हैं ॥ मात० । (हाथ से दिखलाकर) जहां वह योगी अचल ठूंठ की भांति सूरज की ओर ध्यान लगाए बेठा है उस से थोड़ी टूर पर कश्यप का स्थान है । राजा आप देखो इस तपसस्‍्वी के आधे शरीर पर बांबी चढ़ गई हे आर जनेऊ की ठोर सांप की केंचुली पड़ी है। कंठ के आस पास सूखी त्वता लपट रही हैं। ल्वटों में पंछियों ने घोंसत्ने बना लिये हैं *॥ दुष्प० । ऐसे उम्र तपस्वी को नमस्कार हे ॥ मात० । (बोड़ों की रास खेंचकर) बस । यहां से आगे रथ न जाना चाहिये। अब हम उस स्थान पर आ गये हैं जहां सवगे की नदी ऋषि के वन को सींचती है ॥ ॥५॥ 90 640070४१७.8. [40०' वा, टुष्प० । यहां इन्द्रलोक से भी अधिक सुख है । इस समय मेरा ध्यान शेसा बंध रहा है मानो अमृत के कण में नहाता हूं ॥ मात०। (रव को उहराकर) महाराज अब उतर ल्नीजिये ॥ टुष्य? । (हपे सहित रथ से उतरकर) तुम रथ को छोड़कर कैसे चत्नोगे॥ मात" । इस का में ने यत्र कर दिया है। आप से आप” यहां खड़ा रहेगा | चल्िये। में भी आप के साथ चलंगा। महाराज इस मार्गे आओ आर बड़ महात्मा तपस्वियों के स्थान देखो ॥ दुष्घ० । जैसा आश्चये मक्के इन तपस्वियों के देखने से होता है वेसा ही इन के पवित्र आश्चवम के दर्शन से सुख मिलता हैं। सत्य है शद्ध जीवों को यही योग्य है कि कल्पवृक्षों के वन में पवन खाकर प्राण रक्‍्खें । जिन नदियों का जतल्न कनककमल्न के पराग से पीला दिखाई देता है उन में स्नान संध्या करें। जिन शिल्नाओं के टुकड़ों से रल बनते हें उन पर बेठकर ध्यान लगावें। अपनी इन्द्रियों को ऐसा बस में रकखें कि कदाचित ” कीई बड़ी रूपवती अप्सरा भी आकर घेरे तो मन न डिगे। जिन पदार्थों के त्िये बड़े बड़े मुनीष्यर तप करते हैं ज्ञो इस आश्रम में प्राप्त हैं ॥ मात*। सत्पुरुषों की अभित्नाषा सदा उन्नम से उन्चम वस्तु पाने के लिये बढ़ती रहती है” । (शक जोर को फिक) कहो वृद्धशाकल्य इस समय महात्मा कश्यप ऋषि क्या कर रहे हं । क्या दक्ष की बेटी ने जो पतिव्रतधम पूछा था उन से संभाषण करते हैं ॥ दुष्प० । तो अभी कुछ ठहरना चाहिये ॥ मात०। (राजा की ओर देखकर ज्याप इस अशोकवुश्ष की छाया में विश्वाम करिये। तब तक में ञझ्ाप के आने का संदेसा अवसर देखकर इन्द्र के पिता से कह आऊं ॥ टुष्प० । बडुत अच्छा । (मातलि गया और दुष्पल्त की दाहिनी भजा फरको हा] हे भुजा ८7 शता.] 643] 07४१५।,8. 9 अब तू व॒या सगुन क्यों दिखाती है। मरे पहत्ने सब सुख मिटकर केवत्न टुख रह गये हैं ॥ . _लष्य में अरे ऐसी चपलता क्यों करता हैं। क्यों त्‌ अपनी बान नहीं छोड़ता ॥ टुष्य० । (कान रूगाकए हाय ऐसे स्थान में ताड़ना का क्या काम हे। यह सीख किस को हो रही ह्टे | (जिधर बोल सुनाई दिया उधर देखके और अआश्चय करक) ज्ाहा यह किस का पराक्रमी बालक है जिसे दो तपस्विनी रोकती हैं तो भी खेल में नाहर के भूखे बच्चे को खंचे त्नाता है ॥ (सिंह के बच्चे को घसोदता हुआ एक बालक आया ओर उस के साथ दो तपस्विनी झऋाई) बालक | अरे छावड़ तू अपना मुख खोलत्ल । में तेरे दांत गिनूंगा ॥ एक तपस्विनी । हे हटीत्ने बालक तू इस वन के पशओं को क्यों सताता हैं। हम तो इन को बाल्न बच्चों के समान रखती हैं । तेरा खेत में भी साहस नहीं जाता “| इसी से तेरा नाम ऋषि ने सवेदमन रक्खा है ॥ टुष्य० । (आप ही आापणे अहा क्या कारण है कि मेरा लेह इस लड़के में पुत्॒ का सा होता आता है । हो न हो” यह हेतु है कि में पुत्रहीन हूं ॥ टू" तप० । जो तू इस बच्चे को छोड़ न देगा तो सिंहनी तुरू पर दोड़ेगी ॥ बातल्क। #ुरुकाक ठीक है । सिंहनी का मुझे ऐसा ही डर है ॥ (रोस में खाकर होठ काठन लगा) टुष्य० । (ज्ञाप ही आप चकित सा होकर) यह बालक किसी बड़ बली का वीये ” हे । इस का रूप उस अग्नि के समान है जो सूखा काठ मिलने से अति प्रज्वत्नित होती है ॥ प० तप० । हे बाल्वक सिंह के बच्चे को छोड़ दे । में तुकके उस से भी सुन्दर खिल्लोना दूंगी ॥ ष््2 ७२ 84370 0४१७।.३. [427 शा, बात्नक । पहत्ने खिलोना दे दो | झाझो कहां है ॥ (हाथ पसारकर) टुष्प० । (लड़के के हाथ को देखकर आप ही आप) चहप्राहा इस क हाथ मंतो चक्रवर्ती के लक्षण” हैं । उंगलियों पर केसा अच्भुत जाल है और हथत्नी की शोभा प्रातकमत्न को भी लज्जित कर रही हे ॥ टू तप०। हे सखी सुत्रता यह बातों से“ न मानेगा। जा तू। कुटी में एक मिट्टी का मोर ऋषिकुमार शंकर के खेत्नने का रक्खा है। सो ले झा॥ प० तप० । में अभी लिये“ आती हूं ॥ (79) बाल्क। तब तक“ में इसी सिंह के बच्चे से खेत्नूंगा ॥ टू" तप० । (बाककक की ओर देखकर ओर मुसक्याकर) तेरी बतल्नेया” त्नूं। अब त्‌ इसे छोड़ दे ॥ टुष्प" । (जाप हो आप) इस लड़के के खित्नाने की मेरा जी केसा चाहता है। (आह भरकर धन्य हैं वे मनुष्य जो अपने पुत्रां को कनियों“ त्नेकर उन के अज्ल की धूल्व से अपनी गोद मेत्नी” करते हैं और पुत्रों के मुख निष्कारण हंसी से खुत्मकर उज्जल्न दांतों की शोभा दिखाते ओर तुतुल्ने बचन बोलते हैं ॥ हूं" तप० । (इंगली ज्वकर) क्यों रे ढीठ तू मेरी बात” कान नहीं धरता हे ॥ (इधर उधर देखकर) कोई क्मषि यहां हे | (दुष्पन्न को देखा) जहो परदेसी जाओ । कृपा करके इस बल्नी बालक के हाथ से सिंह के बच्चे को छड़ाओ ॥ दुष्य९ । ऋप़च्छा । (रूड़के के पास ज्ञाकर झोर हंसकर) हे आषिकुमार तुम ते तपोवन के विरुद्ध यह आचरण क्यों सीखा है जिस से तुम्हारे कुत्न को तल्वाज आती है। यह तो काले सांप ही का धम है कि मत्नया- गुह से त्निपटकर उसे टूषित करे ॥ (रूइके ने सिंह को छोड़ दिया) टू० तप० । हें बटोही में ने तुम्हारा बड़त गुण माना “। परंतु जिस को तुम ऋषिकुमार कहते हो सो ऋषि का बालक नहीं है ॥ टुष्य० । सत्य है । इस के काम ऐसे ही साहस के हैं कि यह ऋषिपुत्र 80०7 शा] 843 ए ए"५.8. 98 नहीं जान पड़ता | परंतु मं ने तपोवन में इस का वास देख ऋषिपुत् जाना था। (छूद॒के का हाथ हाथ में छेकर आप ही आप) उप्राह्य जब इस का हाथ छने से मुझे इतना सुख हुआ है तो जिस बड़भागी का यह बेटा है उस को कितना हथषे देता होगा ॥ टू० तप० । (दोनों की ओर देखकर बड़े अचंभे की बात है ॥ दुय० । तुम को क्यों अचंभा इञआ ॥ टू” तप" । यह अचंभा है कि इस बालक का तुम्हारा” कुछ संबन्ध नहीं है तो भी तुम्हारी इस की” उनहार बड़त मिल्नती है। आर टूसरे यह अचंभे की बात है कि यह तुम को आगे से नहीं जानता था ओर अभी इस की बुद्धि भी बालक हे तो भी तुम्हारी बात इस ने क्यों तुरंत मान ल्नी ॥ टुष्य० । (लड़के को गोद में उगाक) हे तपस्विनी जो यह कऋषिकुमार नहीं है तो किस का वंश ” है ॥ टू" तप० । यह पुरुवंशी हे ॥ दुष्प” । (आप ही आप) इसी से मेरी इस की” उनहार मिलती हे । (उस को गोद स उतारकर) (प्रगढ) परूवंशियों मं यह रोति तो निश्चय हे कि युवावस्था भर रनवास में रहकर पृथी की रछ्ला ओर पालन करते हैं। फिर जब वुद्दधापन आता है वानप्रस्थाश्रम त्नेकर जितेन्द्री तपंस्वियों के आश्रम में वृक्षों के नीचे कुटी बनाकर रहते हैं । परंतु मुफे झआश्चये यह हे कि इस बालक के देवता के से चरित्र हैं। यह मनु का वीये क्योंकर होगा ॥ टू तप० । हे परदेसी तेरा सब संदेह तब मिट जायगा जब तू जान त्लेगा कि इस बालक की मा एक अप्सरा की बेटी है ॥ दुष्य० । (आप ही आए) यह तो बड़े आनन्द की बात सुनाई। इस से कुछ आर झासा बढ़ी। हअगणगे इस की माता का पाणियहण किस राजषि ने किया है ॥ 04 84 70४१७॥,४. [&८५ (ता. टू" तप०। जिस राजा ने अपनी विवाहिता स्त्री को विना अपराध छोड़ दिया है उस का नाम में न लगी ॥ दुष्प० । आप ही आप) यह कथा तो मुक्की पर लगती है। भत्मा अब इस बात्नक की मा का नाम पूछं। (कोचक परंतु सत्पुरुषों की रीति नहीं हे कि पराई स्त्री का वृत्नान्त पूछें “ ॥ (पहली तपस्विनी खिलोना लेकर खाई) प० तप० । हे सवेद्मन यह केसा शकुन्तत्नावण्य ” हैं ॥ बात्नक | (बड़े जब से देखक/ कहां है शकत्तत्ना मेरी माता॥ दोनों तप० । (हंसत्ी हु) यहां तेरी माता नहीं है। हम ने दुद्र्थी बात कही थी। अथेात सुन्दर पश्ठछी दिखाया था ॥ टुष्य० । (आप ही आप) इस की मा मेरी ही प्यारी शकृन्तत्ना हे या इस नाम की कोई दूसरी स्त्री है। यह वृत्तान्त मुझे ऐसा व्याकुल् करता है जेसे मृगतृष्णा यासे हरिण को निरास करती है ॥ बात्वक | जो यह मोर चले फिरेगा ओर जड़ेगा तो मानूंगा। नहीं तो नहीं ॥ प० तप० । (घ्बराकर) झआहा बालक की बांह से रक्षावबन्धन कहां गया॥ (खिलौना छ किया) दुष्प० । धबराझ्मो मत। जब यह नाहर से खेत्न रहा था तब इस के हाथ से गंडा गिर गया था। सो वह पड़ा है। में उठाकर तम्हें दिये देता हू ॥ (उठाना चाहा) 5 दोनों तप" । हाय हाय इस गंडे को छना मत ॥ प० तप०। हाय-इस ने तो उठा ही त्निया ॥ (दोनों आपस में अच॑भे से देखने लगीं) । टु० । गंडा यह तल्नो। परंतु यह कहो कि तुम ने मुझे इस के छूने से रोका क्यों था ॥ टू" तप० । इस लिये रोका था कि इस यन्त्र में बड़ी शक्ति है। जिस 4८7 शाा.] 6 0 ए१'७॥.5. 95 समय इस बालक का जातकम " हुआ था तब महात्मा मरीचि के पुत्र कश्यप ने यह गंडा दिया था। इस में यह गुण है कि कदाचित धरती पर गिर पड़े तो इस बातल्वक के मा बाप को छोड़” दूसरा कोई न उठा सके ॥ दुध० । और जो कोई उठा ले तो क्या हो ॥ प० तप० । तो यह तुरंत.सांप बनकर ” उस को इसे ॥ दुध्घ० । तुम ने ऐसा होते कभी देखा है ॥ दोनों तप" । झनेक वार ॥ टुष्प० । अस्त होकर तो अब मेरा मनोरथ पूरा हुआ ॥ (छूड़के को गोद में छे लिया) टू" तप० । आओ सूुत्रता । ये सुख के समाचार चलके शकुन्तत्ना को सुनावें। वह बड़त दिनों से वियोग के कठिन नेम कर रही है ॥ (दोनों बाहर गई”) बालक। छोड़ो छोड़ो । में अपनी माता के पास जाऊंगा ॥ दुष्घ० । हे पुत्र तू मेरे संग चत्नकर अपनी माता को सुख दीजिये ॥ बालक । मेरा पिता तो दुष्यन्त हे। तुम दुष्यन्त नहीं हो ॥ दुष्य० । तेरा यह विवाद भी मुफ् प्रतीति कराता है ॥ (वियोग के वस्त्र धारण किये ” और जदे हुए बालां को वेणी पीठ पर डाले “ शकन्तला आई) शकु०। आप ही आए) में सुन तो चुकी हूं कि बालक के गंडे की टिव्य- सामथ्ये का गुण प्रगट हुआ । परंतु अपने भाग्य का कुछ भरोसा नहीं है । हां इतनी आझाशा हे कि कहों” मिश्रकेशो का कहना सच्चा हो गया हो ॥ टुष्पय? । (हब और शोक दोनों से) क्या योगिनी के भेष में यह प्यारी शकुन्तत्ना है जिस का मुख विरह के नियमों ने पीला कर दिया है ओर वस्त्र मत्नीन पहने जटा ” कंधे पर डाले मु निर्देई का वियोग सहती है ॥ शकु? । (राजा की ओर देखकर ओर संशय करक) यह क्या मरा ही प्राणपति हट 96 847 ए५१'५,5. [4८% शा, जो वियोग कौ आंच से ऐसा कुम्भित्ना रहा है । जो मेरा पति नहीं है तो कोन है जिस ने बातल्क का हाथ पकड़कर अपना कहा ओर मुझे टूषण लगाया । यह कोन हैं जिस को बालक के गंडे ने बाधा न करी ॥ बातल्वक । (दोइ़ता हुआ शकुलला के पास जाकर) माता यह किसी के कहने से मुझे अपना पुत्र बताता हे ॥ दुष्यघ० | हे णारी में ने तेरे साथ निदुराई तो की। परंतु परिणाम अच्छा हुआ कि" तें ने मुझे पहचान त्निया। जो हुआ सो हुआ | अब उस बात को भूत्न जा ॥ शकु० । (आप हो आप) अरे मन तू धीरज धर । अब मुक्के भरोसा हुआ कि मेरे भाग्य ने ईषा छोड़ी। (एग० हे आयेपच मेरी तो यही अभि- त्वाषा है कि तुम प्रसन्न रहो ॥ दुधघ० । णारी भ्रम में मुझे तेरी सुध न रही थी। सो आज देव का बड़ा अनुग्रह हे कि तू चन्द्रमुखी फिर मेरे संमुख आई जेसे परहण के अन्त मं रोहिणी फिर अपने पारे कल्नानिधि से मिलती है ॥ शक०। महाराज की इतना कहते ही गदगद्‌ बाणी होकर आंस गिरने लग) दुष्ध० । हे सुन्दरी में ने जान त्निया तू जय शब्द कहा चाहती थी। सो आंसुओं ने रोक त्निया। परंतु मेरी जय होने में अब कुछ संदेह नहीं हे क्योंकि आज तेरे मुखचन्द्र का दशशन मित्न गया ॥ बात्नक | माता यह पुरुष कोन है ॥ शकु० । बेटा मेरे भाग्य से पूछ ॥ (फिए रो उठी) दुष्प" । हे सुन्दरी अब तू अपने मन से मेरे अपगुणों का ध्यान बिसरा दे । जिस समय में ने तेरा अनादर किया मेरा चिन्न किसी बड़े भ्रम में होगा” । जब तमोगुण " प्रबल्न होता हे बह़धा यही गति मनुष की हो जाती है जैसे अंधे के गत्ने में हार डालो और वह उस को सपे समभककर फंक टू ॥ (यह कहता हुआ पैरों में ' गिर पड़ा) 4८7० ५ा.] 657 ए ४१ ७.3. ५7 शकु० | उठो प्राणपति उठो । मेरे सुख में बढ़त दिन विप्न रहा परंतु तुम्हारा हित अब तक मुक में बना है । यह बड़े सुख का मूत्न हैं। (राजा जग) मुझ दुखिया को सूध केसे झ्राप को आई सो कहो ॥ टूष्यण । जब विरहबिथा का कांटा मेरे कल्नेजे से निकत्न जायगा तब सब वृच्नान्त कहंगा । अब तू मुझे अपने सुन्दर पत्नकों से आंसू पोंछ देने दे जिस से मेरा यह पछतावा टूर हो कि उस टिन में ने भ्रम में आकर तेरे आंस देखे अनदेखे किये थे ॥ (आंसू पोंडने को हाथ बढ़ाया) ५. शकु० । (अपने आंसू पोंछकर और राजा की उंगली में अंगूठी देखकर) उंप्रहा यह वही बिसासिन ऋंगूठी हे ॥ दुष्यघ० । इसी के मिलते मुझ तेरी सूध आई ॥ शक॒० । तो यह बड़ेगुणभरी ' है कि इस से फिर ऋाप को गई” प्रतीति मुझ पर आई ॥ दुधध० । हे यारी अब तू इसे पहन जसे ऋतु के चिष्ट के लिये पृथी फूल्त धारण करती है ॥ शकु० । मुे इस का विश्यास नहों रहा है। ञ्राप ही पहनो ॥ मातलि आया) मातत्नि । महाराज धन्य हे यह दिन कि ज्ञाप ने फिर अपनी धमंपली पाई झोर पत्र का मुख देखा ॥ दुष्प० । मित्रों ही की दया से मेरी अभिलाषा पूरी हुई है। परंतु यह तो कहो कि इस वृत्नान्त को इन्द्र जानता था या नहीं ॥ मात० । (सकरण देवता क्या नहीं जानते हैं। अब आओ । महात्मा कश्यप ञ्आञाप को दशेन देंगे ॥ दुष्प० । यारी चतल्नो ओर सव्वेद्मन की भी उंगतल्नी थामे चत्नो । महात्मा का दशेन कर अर वें ॥ शकु० । आप के संग बड़ों के संमुख जाने में मुभेर त्नज्जा आती है ॥ 0 98 850700.४१'७.5 , [4८% शा, दुष्प* । ऐसे शुभ समय में एक संग _ चत्मनना बहुत उन्नम है। ऐसा सभी करते आए हैं '। चत्नो । वित्नखख मत करो ॥ (रब आगे को बढ़े) स्थान । सिंहासन पर बेठे हुए कश्यप ओर अदिति बाते करते हुए दिखाई दिये ॥ कश्यप । (राजा की ओर देखक0 हे दछ्युसुता तेरे पु"॒ की सेना का अगर गामी मत्येत्वोक का राजा .दुष्यन्त यही है। इसी के धनुष का प्रताप है कि इन्द्र का वज्न केवतल्न शोभा मात्र रह गया है “ ॥ उटिति। इस के लक्षण बड़े राजाओं के से दिखाई देते हूं ॥ मातत्नि । दुषन रे) हे राजा द्ादश आदित्यों” क माता पिता आश्ञाप की ओर पार की दृष्टि से ऐसे देख रहे हैं जेसे कोई अपने पुत्र को देखता है। ञ्ञाप निकट चल्नो ॥ दुष्प० । क्या ये ही दक्ष की प्त्रो ओर मरीचि के पुत्र हें | ये ही ब्रह्मा के पात्र पोत्री हें जिन को उस ने सृष्टि के आदि में जन्म टिया था ओर बारह आदित्यों के पितर कहलाते हैं । क्या ही हैं जिन से ब्रिभवनधनी इन्द्र ओर बावन अवतार उत्पन्न हुए ॥ मातत्नि | हां ये ही हें | (दष्पन्त समेत साष्टाज्रदयइतव की हे महात्माओओ राजा - टुघन्त जो अभी तुम्हारे पत्र वासव “ की आज्ञा परी करके आया हे प्रणाम करता है ॥ कश्यप । झखरार राज्य रहे ॥ अदिति। तुम रण में अजित हो ॥ शकु० | महाराज में भी आप के चरणों में बात्मक समेत प्रणाम करती हूं ॥ कश्यप हे पुत्री तेरा स्वामी इन्ट्र के समान ओर पुत्र जयन्त के तलय हो । इस से उच्चम ओर क्या आशीवोद दूं कि तू पुत्तोमन की प्री शची के सटृश हो ॥ अदिति। हे पुत्री तू सदा सोभाग्यवती “ रहे। और यह बात्नक दीघोयु ८ शा.] 5506 007५,3. 99 होकर तुम दोनों को सुख दे ओर कुत्न का दीपक हो। आओ बिराजो “॥ (सब बेह गये) कश्यप । (शक रक को ओर देखकर दुष्पन्त से) तुम बड़े बड़भागी हो। ऐसी पतित्रता स्त्री ऐसा आज्ञाकारी पुत्र ओर ऐसे तुम आप यह संयोग ऐेसा हुआ है मानो श्रद्धा ओर वित्न ओर विधि तीनों इकट्रे डुए ॥ दुपध० । हे महषि ञ्राप का अनुम्रह बड़ा अपूवे हे कि दशन पीछे हुए मनोरथ पहल्ने ही हो गया । कारण ओर काये का सदा यह संबन्ध है कि पहलत्ने फूल होता है तब फत्न लगता है । पहले मेघ आते हं तब जत्न बरसता है। परंतु आप की कुपा ऐसी है कि पहल्ने ही फल प्राप्त करा देती हे ॥ मातत्नि । महाराज बड़ों की कृपा का यही प्रभाव है ॥ दुष्य" । हे मरीचिकुलभूषण ञ्ञाप की दासी शकुन्तत्ना का विवाह मेरे साथ गन्धवेरीति से हुआ था। फिए कुछ कातल्न बीते अपने मायके के त्नोगां के साथ यह मेरे पास आई। उस समय मुक्के ऐसी सुध भूत्व गई कि इसे पहचान न सका ओर अपनी पल्नी का त्याग करके आप के कुल का अपराधी हुआ “। फिर जब इस अंगूठी को देखा तब मुरे प्राणयारी की सुध आई ओर जाना कि जञआ्आञाप के सगोत्री ” कन्‍्व की बेटी से मेरा ब्याह हुआ था। यह वृत्नात्त हे महात्मा बड़े आश्चये का है । मेरी बुद्धि उप्त मनुथ की सी हो गई जो अपने सामने जाते हुए हाथी को न पहचाने कि यह क्या पश है। फिर उस के खोज देखकर समके कि हाथी था ॥ कश्यप । जो अपराध विना जाने हुआ उस का सोच ऋपने मन से टूर करो । ओर “ में कहता हे सो स॒नो ॥ दुष्प" । मं एकाग्नचित्न होकर ” सुतता हैं । आप कहें” ॥ कश्यप । जब अप्सरातीथे में तुम्हारे परित्याग से शकुतत्ना व्य.कत्न हुई तब मेनका उसे लेकर अदिति के पास ऋरई । मं ने उसी समय ०0०2 ]00 857 0४१'७॥.8. [4८० शा, अपनी योगशक्ति से जान त्निया था कि तुम ने अपनी धमेपत्नी को टुवासा के शाप बस होकर” छोड़ा ओर इस शाप की अवधि मुदरी के दशेन ही तकहै॥ दुष्प० । (आप ही जाप) तो में अपराध से बचा ॥ शकु० । (आप ही आप) धन्य -हैं मेरे भाग्य कि स्वामी ने मुझे जान बूककर नहीं त्यागा था । शाप से ऐसा हुआ | ओर अब बड़ी शुभ घड़ी है कि राजा ने फिर मुके पहचान त्निया। जिस समय यह शाप हुआ में अपने आपे में न हंगी “। मेरी सखियों ने सुना होगा परंतु लेह के मारे मरू से न कहा । तो भी चलते समय इतना कह दिया कि जो कहीं तेरा पति त॒भे, भूल जाय तो यह अंगठी टिखा दीजिये ॥ कश्यप । (शकुलला की ओर देखकर) हे पुत्री अब तें ने सब वृत्तान्त जान ल्निया। अपने पति का झपराध मत समक । उस ने शाप के बस तेरा अनाटर किया था | अब वह भ्रम मिट गया ओर तू रानी हुई जेसे ट्पण जब तक धुंधल्ला रहे तब तक उस में प्रतिबिश्ब नहीं पड़ता फिर निमेत्न होते ही मृति ज्यों की त्यों " दिखाई देती है ॥ टुष्प० । महात्मा सत्य है। उस समय मेरी ऐसी ही दशा थी ॥ कश्यप । बेटा कहो तम ने अपने इस पत्र का भी जिस के जातकमे ” में ने आप वेट्विधि से किये हैं कुछ त्नोड़ प्यार किया कि नहीं ॥ टुष्खघ० । महात्मा यह तो मरे वंश की प्रतिष्ठा हे॥ . कश्यप | यह भी जान त्नो कि यह बातल्नक अपनी वीरता से चक्रवर्ती होगा । ओर सातों" द्वीप में अखणरइ राज्य करेगा । जेसे इस ने यहां बालपन में वन के सिंह इत्यादि दुष्ट पशुओं को टणड देकर सबेदमन नाम पाया है रेसे ही युवा में प्रजा को भरण पोषण करके भरत” कहत्नावेगा ॥ टुष्य० । जिस बात्नक को आप से” महात्मा ने शिक्षा दी हे वह निश्चय सब बड़ाइयों के योग्य होगा ॥ 4९० शा.] 8457 ए१५॥,8. ]0 अदिति | अब शकुन्तत्ना ने फिर अच्छे टिन टेखे। इस त्निये कन्व जी को भी यह वृत्तान्त सुनाना चाहिये । ओर इस की माता मेनका यहीं है। वह तो सब जानती ही है ॥ शकु० । (आप ही आप) इस भगवती ने तो मेरे ही मन की ” कही ॥ कश्यप | अपने तप के बल्न से कन्‍्व जी सब वृत्ञान्त जानते होंगे। परंतु यह मह्गल्ल की बात है। उन को स॒नानी चाहिये ॥ दुष्य० इसी से मुनि ने मुझ पर क्रोध न किया ॥ कश्यप । (सोचकर समाचार हमी कन्व को पहडुंचावेंगे । कोई हे ॥ (एक चेला आया) चेत्ना । महात्मा क्या ग्ाज्ञा हे ॥ कश्यप । हे गालव तुम अभी आकाशमागे होकर ” कन्व के पास जाओ आर मेरी ओर से यह शभ समाचार कह दो कि टुवासा का शाप मिटने से आज दुष्यन्त ने पुत्रवती शकुन्तल्ला को पहचानकर अज्ञीकार कर टिया ॥ चेत्ना । जो आज्ञा ॥ (गय) कश्यप । अब पुत्र तुम अपने “ स्त्री बालक समेत इन्द्र के रथ पर चढ़कर आनन्द से अपनी राजधानी को सिधारो॥ टुष्य० । जो आज्ञा ॥ कश्यप । हम आशीवाद देते हैं कि इन्द्र तुम्हारे राज्य में अच्छी वषा करे “। ओर तुम यज्ञ करके इन्द्र को अनुकूत्म रक्खो। इस भांति तुम्हारा परस्पर उपकार होने से दोनों त्लोक के वासी युगानयुग “ सुख पावेंगे ॥ दुध्थ । हे महात्मा जहां तक हो सकेगा ” में इस सुख के निभिन्न सब उपाय करूंगा ॥ कश्यप । अब आओ र क्या आशीवोदट दें ॥ दुष्प०। जो आप ने कृपा की है इस से अधिक ओर आशीवोाद ]02 80 0५१'७,8. [4०% शा, क्या होगा” । आझोर कदाचित आप प्रसन्न ही हए हो” तो यह अशोवाट दो कि राजाओं को बुद्धि प्रजा का सूख बढ़ाने में प्रकृत् रहे । ओर वेट्पाठी सरस्वती” के पूजन में चित्न लगावें । ओर नीलकरण्ठ लोहितजटा स्वयंभू सदाशिव “ मुझे इस संसार के झावागमन से छड़ावें ॥ । कश्यप । तथास्तु ॥ (सब बाहर गये) ]]3 ॥ समाप्तम्‌ ॥ जियपपएपैप रे + «मर -पफपफपे ( 08 ) १0।॥७ 0 १|]॥ ७/८[॥७४॥]।५॥,॥, दर ००७०० >०»+»»-भ०»म-०ज++ह पी क>-+० कम» «ा%» >> भभमभभ मम $##*+*- [५४७॥ 8 7श्शशि'शा९6 48 7806 4'07/ 076 ॥06 (० 87006/"', 8 7066 | ॥6 88776 40९६ 58 ७ एए५७ 080९॥060, प्रा।0888 006/'७56 8]/९0760. ] ]. ॥96 8 था ॥06टी॥4क0।6 एक४६ एक. 7शशि'- जाए 0 0े)ं९द्तंए९, धाते प३९१९ व 8 8९86 थोदा॥ 60 09६ ० ॥6 ९०णा[पएालाए6 छक्काह0०९, 0प व॥- एणाााएू 8 एणाग्राप्क्चा९6 रण 6 8लांगा 590:0॥ 0, 0फ्जाए 06 0ं॥6 ववीांट्श्वाश्ते 97 ॥6 78 ए९0 0 06 8९॥06९॥06 ॥ छकरांटा 7॥ 0९८प्र.5.. ॥॥6 जात (॥4१76, ंप४. 9076, 8 87][6९४ एव, धशाते ६6076 728 ॥8 वावी6हांगाब 90967, 2. ॥76 8982०-व7९७/०॥78 76 | ॥॥6 एक, 6९786, 9९८56 6 8९007 ३8 ह९॥6/8।|ए 98- प076त ४9९0०7/6 ॥6 8]/6९९) ९०गर78॥068. 8. ॥फ॥6 9|8टी: 8॥९]096 छ8 ग्रापटी €86श॥6€वते 607 8 87, ७०] छ३8 ॥6 ब.7"077798/6 0688 ० ॥086 एछ)0 ह6ए०0९वं 06 |&९१ 904ीणा ० विश ]98 0 ]0]ए पाल्ताशभांणा : 866 एप, ॥. 64, ४.6. पर6 शावे णा शरांका फांड शा ॥ाप- 70]]ए श्टा'82९8 8 ]6]6 60 96 40 07 88072] एपा))08९8 ; 866 '(ध्ाए, ग. 28. 4. 766. “8 प0प्रष्टा)। ० ऐड वद्कापरा'8 48 60िप- ॥0,--([60 8) 88 ॥0पष्टी ? &2, | ००पोत 9७ ०])7079]] ए 4786760 ४9९06 १76॥४0% 8. #8ए9 ॥8 €]९6 27क7), “ हवप6त जश्ञांती & पॉंतिशा,? 07 ९६४९ छाती & ए०णावेश्पय 009, ९७]९० शितव798,.. उिशाहिए शिागर5 ॥6 |॥छ',._ 7॥6 पक (5 गालीत]€8 प्र5 40 प्रातेकडाशाते 8 9070, 988 []6 (0066१ 8 6० फकं॥9 ॥)08॥ ए 85७ बोबशबओं छाती ह9828 ॥0706/६. 6. ?]फ्रों 67 शांगरपरछ',. कांड 8 07076. पुफ& वालंतेशा। फ्ा'0080]ए श।ए्रते€त 00 श्ा। ४86 लिप्त गा श।हइणा5 भांशातप-)9प7/8098 (९९. 09 ॥0%. ऋ. प्॥॥), ४०. 4. ७9. 8. 7. #406 , . . - #40/6, “०६ 0०76 धागा6 . . &( 9706॥' ॥6. 8. 70880 $श॥8९8, 40 ९5छ7/९58 6 7इञंताए ० 06 #थवाशं॥0ा8,.. 7.6/. “866 ! ॥6 ॥83 80.९ » 6 ॥88 ]एा१7७९०,”? &८. 9. ॥#686 धापे 78 ८णा2०॥6/8 8/'8 '९60९॥॥ए प्र5९0, 88 ]676, 7/2९१९०४०॥७। ४, 0060 4/07702४- पए९ए, 76 8९॥86 43, “ 8९९, छ8६ 8 00प्रा0 ॥6 गह8 दशा [?? 0., ॥६ 8 ॥04 ॥॥7"'60(7९॥।॥।ए प्र5९०, 88 ]8॥'8, ]॥ 4]6 8९॥86 0“ 80702) ॥8.? ], 4%7%क#-., “ स्6 ४एए०श5 वुषं०8 पए र्णी 06 7०? प्७&6 ०76 |7९ए०४ं४०ा 2.0०76९0॥5 8॥0[.6/'. 2., 6४/66 #776 07 बं४/६ ॥॥0'७]ए ॥68॥8 “6 डंडा; 9९4|]8 0/' 8 श्रांएश॥,?? ॥€8.०९८४ए९।४- 8. ४ ॥॥6 एश'ए शंश्र ० पा 43 ॥0६ 888५. 8. 4; 67७0 ४ ग्राधाशव० 6 हु/०प्राते ॥88 96९९श॥ प्रातंपरबा2.? ०४0०० 8 (/6 8 गश'९, धाते 0ी0॥ ९|४९७)७/९, 06 €तुघांए8९॥(६ 0 ४ ॥88 0९९॥.”? 4, 4॥6 एशफबकों ॥९)९४॥07 तै९068 ॥6 '९]९- प्र0॥ 0॥॥6 86... 6 एम 2गाडाब्ा। ९ी९टीत॥88.7 6. 6# ४#-- “]९४९)।,” «८ प्रगांतिपा,?? 6, ८ ] (700 90प705.7 7. ॥० बुकष्ध 8 था ४06पंत्रांठ्य ० छपटी ९ [7856 88 /0 ६96 7६6 ६९६४ ॥4४ ४३ /56 36६॥ ६7" 77679 /067"४॥96. _]8, 866 ॥066 9. ]9. 866 ॥0०66 0. 20. 06, “6ए९॥ ॥6 ते& ०0० (हशा") ॥00 8 हात 7० थािटी। (60 शा) ; 7 तक 8, ९५ 0०प्रा४7779ए9९व 06 ए९/ए तप 78564 9ए धीशा। 0एछ॥ ]00'४ि. 2]., #६+'४४ ॥९78, छापे ॥॥ ग्राह्माए 000' ए]820९8 ]88 [6 8९॥86 0 8८, ४“ छा0॥., 304 ६0फ%8 १0 "'पम्3 8436 ए१'७॥,0. 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[बहुब॥ 4९४6, 8 *40 फ्राशध७ >0०णा (0 8790॥॥6).7 72, 47 ककन,, ४ स्छतः लए 9>बशापिंग९8४ व8 (88 (6 छा ९७]॥४९6. 7? 78. १06 4068 8, 08६ 58|-प्रा।4॥ 8 ७च्चड- चिए 07 गय( १057, 88 (09) ९०पघा४ाआएु ॥0005- एशको5, ७० 876 ज०परा0९0 ७४ ॥९॥ ॥8880॥९0 ९0॥९९४., 74. 4]| ए९"७७ ० बककयाए, 5फश्बेपाएू, &९., धावे 788९8 0 शांग्रा|क्ा" ग790%, 789 6 (6 ४४७- [9४९५ 765. 8९6 706 769, 8७ [. 76. (बकक४ 6009 /#6 %०परौत, ०तााशापीए, 9७७ ९0०शंते९/९त 88 8प्री लए, 77. 7५कछ#., “ 8॥7, ]0ए6 ६ ऐंड गीवंशाते 778)7९8. 6 त€श्ञा/0प5 ० इ|प79 $0॥7९।एु 770/8.7? 8. इझकबां। ॥बल॥॥ 8. प्रावेशडा००्त ग्रा छगी ९४8९8, 79. 2%9०४थ., ““ हर0ज 9०ए ७076 ७6 ०४|७४।९ 0 88 एां॥9 ॥67 |. 80. 2५क४8., “१, 6 गाए फुछ्ाप, था ग था 768|0९28 ए0०प्रा'्ते,?? 8. ॥॥6 ९०]. फुछ, ॥6९7९, थ्वाते ॥९तुप्शा।9 ९३९४७॥९१९, 48 ग्रापट 56 06 #/ाए९. “9 8|९ककघा9 8ाट। छ0०708,” &८. 82. “॥0९॥०ए४९९ ४५४ ग्राशाए ७ए९४.” . 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(....क्‍3५४ “॥ ७7०॥०९७?) 8. 98४... 2. 06807 ॥ & 'प7/0, छ0 8७20५ करसालूय (7007 59७॥3, कृष्शासार) &. %. 7७ ७98९८८ &7000%6- कलानिधि (5973. ०0790ए7वते ०/ कला * 78५9,” धगवे निधि 76०७7४8०७ ”) &. %. 7७ ॥7९७8प्रा'प 0 7898 ; & 7876 07 06 )(007- कल्पना &. « 77788778007., ह॥0प90, ०0०॥- ०९.४०४. कल्पना करना _ 60 809.086.7 कल्पलता (कल्प + लता) 3... 4 ००००.४४४ फए४० 507070,00 छ४7' ७ ।7, (५7,08584 8९. जांशवांग? ०एश'ह शांशी ; शंका 00 0 |:04.9/0/6/"४, कसर (00777007 0 006 7७00 25) 8. १४. [ए०र्ष०९०४००, 9]0773॥, कह आना ०. 9. 70 8&770प706- कह, देना ७. 6. 70 १6०४७०७, ४७७, ४९, कही' 660. 507र०णशी०0०७९, धाएज)0७8: $6- ढुए९००॥)ए पएड5९१९ ज्ञात 8प्रोगुंपप०ांए०5, छात्े 8706०)॥ 6, ॥0 779फक्‍ए व0प960 07 पराठछ/- 0) कालंगड़ा ०० कालांगडा 8. %- 700 ग्रक्मा76 0 & ४49 07 808... (7४. 7?]86068 ॥88 'रंग्रती ए 877776व4 (6 ई००जांग््& ०ए7700४५ए : काल + अन+ गड़ा (55 गढ़ा) “ ए्र/एगॉंडआ९त ग्राशकचषप्या'8 27 गत 4 फ्रांगोर ॥96 35 6०९४- गए एं80॥ कुआरी (70०॥ 358॥8. कमाए) 8... 4 7१, ह १) ४९७) मे कुम्मि़॒क 8. %. 2४ ऐश: कम्भिक्ाना (8 077 0 कम्हलाना) ०. 6. धणते #. प0 छ876. 70 ज्ञांग्र७:, 00 96 0॥970९१. कम्हलाना ४. ७. 7० 0॥9806, 0]880 करवक 8. %४. 6 ऐि९ते करा 7/870॥- कुरा (४०० 5073. कुरवक) 8.४. उिक्ोेछ्पं8; 06 6१ छाक्षा'क्या- कसमय 8. %. 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"00 ०8८३७ 60 80]0687', 60 8॥0छ- दया लाना ०.४०१४४४६४. 70 ॥8४७ 7097 (००, पर) . दाभ (8 007पए४०7 0 ४6 5973. दभे) &./. ](१$9-87"888. दासीज्ञाया (5973. दासी 8. [ ७7786 8]8४७,”? धागे ०07प0४०7 0०/ ज्ञात ७. [०४४ ' 9077.??) 8. १४० 06 807 078 60778)6 8]8४6. दिखाई देना ७. ४07४6... 0 8979०४०", 80९07. दुधर्थी (०००एए४०ा ०! दो + अधिन) व. 420प00]6 7रा९७7798., ७&77079'70प5. दुपहरो (दो + पहर) &... (क्‍0-089. दीप्िमान 6०]. 889787॥- दीप्पमान 6०]. 8777४. दृष्टि करना ०. ४०१४४. 0 ]00६ (एफ॒००, पर). देह 8... 8गवे %. 6 90०१7. फ्रां3 जाते 45 70880. 8007 -3678768, के (677. 7 प्राक्षा ए 09७7७ 7७7५8 07 [गवी७. द्वादइश आदित्य 566 7006 80, 4७ शा. घ धकधु॒काना (७ 7077 ० धकधकाना) ७-%. 70 ]7080]78/606 . भृष्ट ००;. 800, 47297067/. न नगीच (प्ताज04 ०0४फफ#ं०्म ० 06 ?0फशंध्ा ध्यते एव ०३27) #०४.9०४६०७ धयते 8. %. ९७; एांथंणां।ए- 8 व0ज़९/' (2/९8७४० _7020%/६/४४) . नामधराई (नामन + धराई 7707 धराना) &. /. क्‍0०४7००४०४७, 0७६४778॥807, निकल ज्ञाना ०. #. 700 80ए०7०७ ४9७9००१, ६० (७४॥ प०7 8700767 77 8 78९०७. निरूुत्साह (निस्‌ + उत्त + साह) 69]. ॥00ए०॑त 0/९7०:४४, ए7९४९7४९४०, ४४९7४७ ६0 8०४४५४७ €5९७ए"प07- निधार करना 0. ॥07४96. 70 8९४8०, 45 जाए 800प्र/8०ए (90०ए०7४७ का) < निष्कारण (निस + कारण) ०6. 870वे 64. ((83७- ]688 ; ०८8७786]688] ए. नीलकणठ (नील + कणठ) 5873. 0079. ७07. ध्यवे 8, %. 3]प06-7708060 ; & ग्रक6 ०0/ 5 ए७- नेक (७ 0777 0? नेक) ००७. 7007 & &07% ४6. प पखरी (७ 0707 0? पखडी) 3... 77४6७ कछ७ 0९ & क्‍0ण़0', पत्चशर (००779. ० 50703. पच्च न्‌ “॥ए6,” 870 शर /“770ज7) 8. %. शे॥० 988 १ए७ ६ए०ए४ ; & 7876 0 78708, 06 80वें ० ]07७. परनारी (पर + नाणी) ४... 470०00९7?$ छा परभृतिका (०० 5078. परभूत ०४८८०० ??) $.7. 6 [70790/ 7876: परायागभे (पराया + गर्भ) 6०). ॥%७४7७7४६ 97 87700067 (पका 0768 #प४०४४१, &०८.) पश्चात्नाप (0०079. ० 598॥8. पश्चात्‌ 8&+९7- ज्ात3,2 87व त्राप “ ०४४०० ?) 8. %. क्‍७770786, 7९]0७ग्रॉध८९- पाणिग्रहण (0०009. ० 5७78. पाणि “ ॥870,” 870 ग्रहण. घोीद्ग8 ?) 8. %.. क्वाफए- 7799. पुरकाय (पर + काये) 8. %. 2. लंइ-ए९०, 87 थषीकिं।' 07 607768070 7०6५9. प्रय्चा (707 प्रति + चच्च) डिछ्याएवं (७70- 0600/ [०६/०) &. #. 4. 00ज-४फाए?9- प्रय्याना (7077 5७73. प्रत्मययन) ७४. 6. "0 007- 406 97, ६0 ४ए४#. प्रातकमल 8. %. 76 ग्रा०णंए2 0008. &77?.,50 ४.४१'.5॥, ७7,05845 8९. प्रीतिपत्र (007). ० दिक्वा5. प्रीज्ि . [076,” छ7वे पत्र “ ]९७६१) &. %. 24. ]0ए6-७९6॥ ०७० प्र फिरकर (5 फिर) 66४०. ै/९2थांग. ब बडप्पन (७ /0770 ०/ बड़ापन) ४. १४. 6780/7688, शाध्याते०प, वीशणां(ज. बड़भागी (बड़ा + भागी) 60]. #'0०7-एण७/०- बड़वानल (7०7 5087$- बड़वा 788,?7 वे झनल 778?) &. %. 5प्रग्राधणं॥७ ॥76. 566 7006 4, #& १][. बन्ध ००" बन्धि 8... 307व92९, 777730ग्राश ७गां बिरुला (70०7 5873. वीरूघ) 8. १. ै. ४8॥7'70, एक. बिलमाना (707 विलस्त) ०. ». 70 १०७ए, 885५, छाए. बिसासिन 60]. /००0. ० विसासी (70०7 ठिश्या5. विश्वासिन्‌ ). ४ए७४78, #एएड-ं79एणं7४ - बिहनो (7० 5०735, विहीन _ जश्ञांति०ए,”? / 0परॉ०० ?) 67). एफ़ण्णा 6 0797 7ा887- 72, " शांति०पा+? ऐंड ज0्ते ढक्वात6 $0 गाल 8947व076१,?7 “]९%,” “ 8क७7%,? “(कशं89,? “ इफशा86.?2 76. ॥88 ० ]8#07" 86786 ॥ 9. 8. बीनना ०. ७. 70 0०८, एए्र०८, 80880, 29७07 (88 गी0श९७7४, &2.)- बेबलता (बेत + लता) 3. 47 8700प्रा', 00श0९7/- भें भय खाना ७. १07४७७/. 700 96 #ग्ांव, भयभीत (भय “687,?' धायते भीतर ७]७77760 ?) हब, 4०वें ज्ञात (९७77: भरदोड़ 660. #6 शो 2७0०9. भागमान 686]. #076ए/8/6- भगताना (६0790003 0 0 भोगना) ४. 6. 0 ट्थ्ा58 ० €ह5ए९0४७४९०७, ०" ९७786 $0 96 7९8)26व ; $0 कुछर्षणफत, ९5४९९०एरऑ०, 7876 व0796 ज्ञांण, भोरी (06 #७7३ ०7 ४6 ७0]. भोरा एरड७ते 8७3 & 5परो0४थ्रा07७) &- /+ 4 &777]8, &70688 77). 85 भोहें (४0%. |7. ० मैं) ७. . 7776070ए४8- भ्यासना (8 /07"77 ०/ भासना) ०. %. 70 89[7०४7, 86670, 06 दा0णश7- म मनभावता (मन+ भावता) 6०). ै/276९७७०।७ ६0 06 ॥687४, ]068&79:- मंद करना 0. %०%४७%ां. 70 छ86८६८७॥ 89666. मनोभव 8. %- 6. 78776 0/ 78708, (6 8४०१ ०/ ]0ए06- मलयागरू (707 मल॒य ४6 ग्रशा6 0₹ & ९०प्रा- 09, णवे अगुरू / 306,7 &0.) ४. %. 7७ 5७709)]-0766. मन्मय 8. १४. .0. 78776 0 ९8779. मसकना ४. 6. 70 $0प7०0, 87076, 80ए6९०8- प%6 ७ए7002ए ० पं5$ ज़0णते 43 (60प्र- पए. 27, 7]8008 988 57220०5।९6 +76 5875. मृश (मशै), 07 स्पशैक 83 006 507706 0 00 ज0णवे; प, 8873 0707 06 ०836, 06९८07॥/ॉां79 म; 000 0०0 ॥686 उठ8ग7रडरा-+ ज्07वेंड जऋ०प्रोत जांशत पञा6 ए॥९तुप्रॉंए-९त 5९३6. मांसाहारी (१० ऐिंधाड- मांस “वी०9,? छाते आहारिन्‌ _ ९&पगगए8 ?) #त. 7]०७४-९७४ए९. मायका 8. ४9४. ४०४९-४३ ॥07086. मोनकेतन (0077). ० 5७73. मीन ॥30,?7 छावे केतन 8ए7700] ?) 8. %. रिं७ ज्ञास्‍086 5ए7090 58 & गीड ; & 78776 0/ 879, 6 89 06 ]0४७. मडेल (8 07 0६ मुंडेर) 3../.. 700 ००फांगड ०! 8 जछ्ञ8!], मनिसुता (मुनि + सुता) 3. 7706 तेबा8॥छए ० 8 शधपगां, 07 इथाए- मुनीशर (००770. ० 5873. म॒त्रि “इक? धावे ईशर ]070 ?) 8.७. (96 का०णाह8 8क्याएड- मुन्यन्न (००79: 07 5873- मनि # इच्बाप्रांए? बणपे खन्न . (006 7?) &. %. 706 #00व 0 इ्यंएंड- मुसक्यान 3... 2. 8776. मुसक्याना (8 0णा 0 मसकराना) ७५%. 0 87]6, &॥77]007. मृगछो ना (मृग + छोना) 8. ;%- 2 शिज्त7- मुगतुष्णा (5873, ०079. ० मृग “ वे€७०? खत तुष्णा . होश750 7?) 3... )धी7886- 86 मृ-ट्लखभाव (मृदुल + खभाव) ००. 700व००- 787९१, मेल खाना ७. %०४४४४%ं, 70 8००००त, 96 47 ॥ 2) ७) ०)) ५0) /।१* : य पन्चस्यान 8. %- ै7॥ 87, 07 9806 407 8820- 7068, योगशक्ति (योग + शक्ति) 8... 70७ 8790७"7७ए7७) 700०ए७7० 07 & ४०९277. मे रजश्ाबंधन (रश्ा + बन्धन) 8. %. 2. ९०ाछ्ाए 07 ()॥॥॥॥॥ (27 रप्ति 8... 2]6885प0; 06 ४०११683 ०0 ]076- रतिपत्ति (०070. ० 5073. रत्ि 88807,” छ7ते पत्चि 788667 7) 8. %- 76 ]07वं 0 988- 807 07 तै6976 ; & 79776 0 ९8779, 66 2०१ 0० ]078- राजलण्सी 8... 2/. 70ए७) ए९]९००३९. रांडका 8. %. 2. 9]0०८४6७१, 8 शांग्राप रोष 8. %. रिप्रागरं780707, ०6फज778 ४06 ०एवे. ल लताकुन्च (०079. ० 598. छत्ा / ७७0९फञांग8 |8760,7 छ7वते कुन्च “छा00प?) $, %. 4. छ०ज्ञछ' ०णाह्ते 97 ७७९7१९७४. लताभवन (5873. छूत़ा + भवन - १७छ०७!॥४7०४ ”) 8. %. 2 8700प7 07 00छ07., लाजवान #१. लाजवती - 66]. ४०१७४. लुरखुरी (७ णिफा 0 लुद्खड़ी) ४. .- 7900५, ९0०७०5ां॥9. ले #(श१. ॥40! ०००७ ! थे ! ले लेना ०. ७. 0 ०७.४पा"७, 5श५७, ४))0709778/०, 68)76 [008368907 0. लोकरीति (लोक + रीति) 3... ४४७४ 43 6076 377 06 ए०्त ; हस्‍6 छ७ए 00 06 छ070. लोकाचार (छोक + आचार) 8. %. ७ ०ए४४०ए/ 0 06 एछ०" १. लोहितनजदा (लोहित + जदा) 609]. 8०वें 8. #. ]86७१-६788960 ; & प्र७6 0 8ए8. . « 5077,20 छ४१७॥, ७7,08848५. व वर्गीश्रम (0०077]0. ० 5७78, व ८०००? 6 / 0880०,” धग्ते आश्रम * 7शॉंए्रांणपड कावेशः 07 ००7्रतांप्रंएम ०] ??) &. %ऋ, 76 5865 07 & 27ए९7॥ 0853 0 802 0ए- वासना 8.7. 2627'6. चासव 8. %. 2. 78776 0 वगता8, 06 90वें ० 776606070 7॥/07070॥98. विन्च 8. %. 70907, डप्रो78/8706- विवाहिता 64. #. »0०व१े 8. 7. ७7760 ; छा. विशाखा 5... )ए७76 0 7 88४०0370, 060 60 96 ]0७४०४३ 0० ४6 ए७४०४७)॥६ए ० $॥6 3007 ई07 ि0४79, 870067 8४९7४870 . वेदपाठी (बंद + पाठी) 8. #%. 4 80घर6०४6 ० ४७ ५७१७५, 8 9णफ). चैभवमान 60). एे ७७॥४४ए; 70०0७, 78277क्‍007- व्यास्तुति (०009. ० 5873. व्याज़ . 6०००,” 870 स्तुत्ति / एछां56 ?) 8... ॥70०75५. श चक्कर 8.98. "6 &प5एा००४३; 8 [0700.007 7७06. शयनस्यान (0०077)- ०६ 5७73. शयन _ 8]60ए॥72,” धागे स्थान “ ए806 ?) 8. #%. 50०फाए8- छ]0धाफा] शा शरचन्द्र (००7०. ० 5878. शरद्‌_.. कपरापाय,?? 870 चन्द्र . 7007 ?) &. %- 7१९ &एफपा॥॥- 7007. शिचिलाई 8... ,00507033, 7९]8:७४४०07. शिरस (७ ००7"प.७४०॥ 0०0 06 5805. शिरी ष) 8. १७- प्रफपा6 ॥०8०७- शिचद्रोह (शिव + द्रोह)8.%४. 706 ध्या2०/ ० 5४8. शिशिर ७ %. 6 ००१ 8०83०॥, शांग्रॉष"- शरब्रूपा (893. १९४ं१७7४४४९०) ४... (00९व०7०९९, * इल०एां00०. ज्ोभायमान (७ [007 ० शोभामान) 6०. 5ञौशा- ॥४१, ७७७पे- स सगुन (७ 00770090ं07 0 डि8. शकन) ४3. 70. 77 07070, #प९ पा" ए- 607770,007४7'3॥, ७7,05843॥2५, सगोत्री (स + गोत्री) 6०). 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